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Is Shahar Mein Ik Shahar Tha

Author: Jaya Jadwani
Edition: 2026, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
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Is Shahar Mein Ik Shahar Tha

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विभाजन भारतीय उपमहाद्वीप का ऐसा दारुण जख़्म है जो न जाने कितने दिलों के भीतर मुसलसल टीस रहा है। जया जादवानी का उपन्यास ‘इस शहर में इक शहर था’ विभाजित सिन्ध और उसके लोगों की कसक और पीड़ा का आख्यान है।

यह एक जगह से उजड़ और बिखर कर दूसरी जगहों पर जड़ें जमाने की संघर्ष भरी दास्तान भी है जहाँ ऊपरी तौर पर भले ही सब‌ कुछ सहज लगता हो पर उनकी रूह का एक हिस्सा कहीं बहुत पीछे के शहर में फंसा रह गया है। अपनी रूह के इसी गुम हिस्से की तलाश में उपन्यास का वाचक ‘नन्द’ कराची पहुँचता है जहाँ से उसे शिकारपुर जाना है, जहाँ जाने की उसे अनुमति नहीं है। जहाँ उसे अपने ही जैसे बिखरे हुए लोगों से मिलना है, जिन्हें उसकी तलाश में इस तरह से मद‌द‌गार होना है जैसे वे अपनी ही मदद कर रहे हों। शिकारपुर—जहाँ उसका बचपन बीता है, जहाँ से निकलकर वह बम्बई में रहते हुए दुनिया भर में भटक रहा है।

यह स्मृति में धँसी हुई एक ऐसी विलक्षण यात्रा है जहाँ एक बूढ़ा आईने के सामने अपने आपसे सिन्धी में बतिया रहा है; कोई बरसों बाद मिली एक बूढ़ी औरत के साथ रोटी खाते हुए उसकी गोद में रो रहा है, वह श्मशान जहाँ नन्द के लोग जलाए गए, वह गलियाँ जहाँ वे चले, उनमें ठहरते और चलते हुए नन्द अपने पुरखों के तलवों का दुख-दर्द जी रहा है। जहाँ से अपने बचपन के प्यार की एक झलक भर देखकर बिना कुछ कहे वह वापस चला आता है कि बार-बार आने की एक वजह यह भी बनी रहे।  

More Information
Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2026
Edition Year 2026, Ed. 1st
Pages 136p
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 20.5 X 12.5 X 1
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Jaya Jadwani

Author: Jaya Jadwani

जया जादवानी

जया जादवानी पिछले तीन दशक से सृजनरत हैं। अब तक उनके तीन कविता-संग्रह—‘मैं शब्द हूँ’, ‘अनन्त सम्भावनाओं के बाद भी’, ‘उठाता है एक मुट्ठी ऐश्वर्य’; छह कहानी-संग्रह—‘मुझे ही होना है बार-बार’, ‘अन्दर के पानियों में कोई सपना काँपता है’, ‘उससे पूछो’, ‘समन्दर में सूखती नदी’, ‘ये कथाएँ सुनाई जाती रहेंगी हमारे बाद भी’, ‘अनकहा आख्यान’ और पाँच उपन्यास—‘तत्त्वमसि’, ‘मिठो पाणी खारो पाणी’, ‘कुछ न कुछ छूट जाता है’, ‘देह कुठरिया’, ‘काया’ प्रकाशित हैं। कुछ यात्रा-वृत्तान्त भी लिख चुकी हैं। सिन्धी में भी उनकी पाँच किताबें प्रकाशित हैं। उन्होंने ‘कृष्णमूर्ति टू हिमसेल्फ़’ और सिन्धी कविता-संग्रह ‘भगत’ का हिन्दी अनुवाद किया है। उनकी कई रचनाओं का अंग्रेज़ी, सिन्धी, उर्दू, पंजाबी, बांग्ला, मराठी और अन्य भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। उनकी कहानी ‘अन्दर के पानियों में कोई सपना काँपता है’ पर टेलीफ़िल्म बनी है।

उन्हें ‘मुक्तिबोध सम्मान’, ‘कुसुमांजलि सम्मान’ और ‘कथाक्रम सम्मान’ समेत कई सम्मान प्राप्त हैं।

ई-मेल : [email protected]

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