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Fijeedvip Mein Mere 21 Varsh

Edition: 2025, Ed. 2nd
Language: Hindi
Publisher: Radhakrishna Prakashan - Remadhav
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Fijeedvip Mein Mere 21 Varsh

ब्रिटिशकालीन भारतीय पराधीनता का एक त्रासद अध्याय है गिरमिटिया। गिरमिटिया यानी एग्रीमेंट के तहत देश के बाहर कुलीगीरी करने के लिए जबरन भेजा जाना। भूख, बेरोजगारी, उत्पीड़न या गृह कलह के चलते घर-परिवार छोड़नेवाले स्त्री-पुरुषों की मजबूरी का फायदा उठाकर उन्हें झाँसा देकर अज्ञात देश में भेज देना। सन् 1879 से लेकर सन् 1916 तक 60553 भारतीय ‘गिरमिटिया’ बनाकर फिजीद्वीप भेजे जा चुके थे।

इन अभिशप्त भारतीयों के शापमोचन के लिए जो लोग आगे आये उनमें एक नाम था पण्डित तोताराम सनाढ्य का। कौन थे ये तोतारामजी? क्या रिश्ता बनता था उनका फिजी से और गिरमिटिया भारतीयों से? परदुखकातर एक सामान्य भारतीय जिन्होंने खुद इक्कीस वर्षों तक गिरमिटिया की यातना-भरी जिन्दगी जी; मुक्ति संघर्ष का आगाज किया।

यूँ तो ‘गिरमिटिया’ प्रथा पर प्रेमचन्द और प्रसाद समेत कई दिग्गजों ने लिखा है पर स्वयं का भोगा हुआ सच सिर्फ और सिर्फ तोताराम सनाढ्य का ही है। इतिहास के अध्येताओं से लेकर आम पाठकों तक के लिए जानकारियों से भरी एक रोचक और जरूरी किताब!

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2009
Edition Year 2025, Ed. 2nd
Pages 127p
Publisher Radhakrishna Prakashan - Remadhav
Dimensions 22.5 X 14.5 X 1.5
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Author: Totaram Sanadhya

तोताराम सनाढ्य

तोताराम सनाढ्य का जन्म 1876 में उत्तर प्रदेश के फ़िरोज़ाबाद ज़िले में हुआ था। 1893 में उन्हें गिरमिटिया मजदूर बनकर फीजी जाना पड़ा। वहाँ 5 वर्ष तक उन्होंने बँधुआ मजदूर के रूप में कार्य किया। करार की अवधि समाप्त होने के बाद वे बँधुआ मजदूरों की सहायता में लग गए और उनके अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष करते रहे। फीजी में 21 वर्ष रहने के बाद 1914 में वे भारत लौट आए। फिजीद्वीप में मेरे इक्कीस वर्ष उनके फीजी में बिताए गए 21 वर्षों के अनुभव का वृत्तांत है। 1947 में साबरमती आश्रम में उनका निधन हुआ।

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