एकसाथ चुनाव की अवधारणा के क्या-क्या सकारात्मक एवं नकारात्मक पहलू हैं; यह देश के आर्थिक-विकास एवं राजनैतिक-स्थिरता के लिए कितना उपयोगी है; इसे भारतीय संविधान में स्वीकृत संसदीय प्रणाली एवं संघीय ढाँचे के अन्तर्गत लागू करना कैसे सम्भव है; त्रिशंकु-विधायिका, अल्पमत-सरकार, अविश्वास-प्रस्ताव, राष्ट्रपति-शासन, आपातकाल इत्यादि से उपजने वाली चुनौतियों का समाधान क्या है, इन सवालों का जवाब देती ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ इस विषय पर एक प्रामाणिक पुस्तक है।
पुस्तक में रामनाथ कोविन्द समिति की संस्तुतियों का गहन विश्लेषण करते हुए इन्हें और प्रभावशाली बनाने के उपाय सुझाए गए हैं। द्विचरण-निर्वाचन की संस्तुति को संघीय ढाँचे के अनुकूल बनाने, अविश्वास-प्रस्ताव, राष्ट्रपति-शासन, निर्वाचन-काल और निर्धारित-तिथि, स्थानीय इकाई निर्वाचन जैसे विषयों पर पुस्तक में दिए गए सुझाव संवैधानिक सुधार हेतु अतिमहत्त्वपूर्ण हैं। पुस्तक में उच्च स्तरीय समिति एवं विधि आयोग द्वारा व्यक्त विचारों व सुझावों का भी समालोचनात्मक विश्लेषण किया गया है।
जनता द्वारा पाँच वर्ष के लिए निर्वाचित लोक सभा-विधान सभा को इतनी अवधि तक सुरक्षित बनाए रखने में और विशेष परिस्थिति में सेफ्टीवाल्व सरकार का गठन लोकतांत्रिक तरीके से करने में आर.वी.वी. प्रणाली कैसे उपयोगी है, और ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ की अवधारणा को कैसे अचूक एवं दोषरहित बनाया जा सकता है, इनपर इस पुस्तक में प्रस्तुत शोधकार्य राजनैतिक सुधार की दिशा में मील का पत्थर है।
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Hard Back, Paper Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 2026 |
| Edition Year | 2026, Ed. 1st |
| Pages | 144p |
| Publisher | Lokbharti Prakashan |
| Dimensions | 22 X 14.5 X 1.5 |