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Bhasha Vigyan

Edition: 2025, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Lokbharti Prakashan
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Bhasha Vigyan

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भारत की भाषाएँ एवं भाषिक एकता तथा हिन्दी
भारत में एक ओर सांस्कृतिक वैविध्य है तो दूसरी ओर सांस्कृतिक एकता भी है। “भारत की भाषाएँ एवं भाषिक एकता तथा हिन्दी” ग्रंथ में एक ओर भारत में बोली जाने वाली चार भाषा परिवारों की 116 भाषाओं की विवेचना प्रस्तुत है तो दूसरी ओर भारत की भाषिक एकता की अवधारणा के सूत्रों को खोजने का स्तुत्य प्रयत्न है तथा इसी ग्रंथ में हिन्दी के वैश्विक महत्व को प्रामाणिक आँकड़ों के साथ रेखांकित किया गया है।
इस ग्रंथ में भारतीय भाषाविज्ञान की बहुत सी भ्रांतियों को दूर करने की पहल की गई है तथा मौलिक, प्रामाणिक एवं अकाट्य मान्यताएँ एवं स्थापनाएँ प्रस्थापित हैं। लेखक द्वारा प्रस्थापित मान्यताओं एवं स्थापनाओं में से निम्न अधिक उल्लेखनीय हैं – (1)इसके पहले देश एवं विदेश के भाषाविदों की यह मान्यता रही है कि भारत के उत्तर में आर्य परिवार की तथा भारत के दक्षिण में द्रविड़ परिवार की भाषाएँ बोली जाती हैं। प्रोफेसर जैन ने इस मान्यता का खण्डन किया है। (2)भारत में प्रत्येक काल एवं युग में कोई न कोई सम्पर्क भाषा रही है। इस कारण तथा भारत के विभिन्न भागों में सांस्कृतिक आदान प्रदान होते रहने के कारण भारत के विभिन्न भाषा परिवारों की भाषाओं में भी परस्पर भाषिक तत्त्वों का आदान-प्रदान होता रहा है।(3)भारतीय भाषाओं के अभी तक जो अध्ययन सम्पन्न हुए हैं, वे लिखित सामग्री के आधार पर हुए हैं। लिखित सामग्री के आधार पर वर्तमान में बोली जानेवाली भाषाओं के सम्बंध में निष्कर्ष निकालना अवैज्ञानिक एवं अतार्किक है।(4)आज भारत में जितनी भाषिक विविधताएँ मिलती हैं उनकी अपेक्षा विगत युगों में ये विविधताएँ एवं भिन्नताएँ और अधिक रही होंगी।(5)भारतीय भाषाओं के अध्ययन के लिए नए प्रतिमानों एवं नई दृष्टि की आवश्यकता है। भारत में बोली जानेवाली  भिन्न भाषा परिवारों की भाषाओं के समान क्रोड के वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित अध्ययन की आवश्यकता असंदिग्ध है।(6)किसी भी विषय का भेद दृष्टि से अध्ययन करने पर हमें अन्तर, असमानताएँ एवं भिन्नताएँ अधिक दिखाई देती हैं उसी विषय का अभेद दृष्टि से अध्ययन करने पर हमें एकताएँ एवं समानताएँ अधिक नज़र आती हैं। विद्वानों ने भारत की भाषाओं के भेदों की जाँच-पड़ताल तो बहुत की है; बाल की खाल बहुत निकाली है किन्तु इस ग्रंथ में विद्वानों के विचार के लिए यह विचार-सूत्र मंडित है जिससे प्रेरित होकर वे भारतीय भाषाओं में विद्यमान सादृश्य के सूत्रों की खोज के काम में प्रवृत्त हों सकें और जिसके परिणाम स्वरूप भारत की भाषिक एकता की अवधारणा और अधिक स्पष्ट एवं उजागर हो सके।
ग्रंथ के दूसरे खण्ड में हिन्दी की अन्तर्क्षेत्रीय, अन्तर्देशीय एवं अन्तरराष्ट्रीय भूमिकाओं की मीमांसा की गई है। प्रस्तुत ग्रंथ, भारतीय भाषाओं की भाषिक एकता एवं हिन्दी भाषा से सम्बंधित समस्त पक्षों एवं आयामों पर, एक साधक की शोध निष्ठा और वैचारिक चेतना का अप्रतिम मानदंड है।
                                                                                                                    प्रोफेसर जी. गोपीनाथन
                                                    सेवानिवृत्त कुलपति, महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा

More Information
Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2025
Edition Year 2025, Ed. 1st
Pages 424p
Publisher Lokbharti Prakashan
Dimensions 21.5 X 14 X 2
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Mahavir Saran Jain

Author: Mahavir Saran Jain

महावीर सरन जैन

  जन्म 17 जनवरी , 1941  हिन्दी के अन्तरराष्ट्रीय स्तर के विद्वान एवं प्रख्यात भाषावैज्ञानिक

शैक्षिक योग्यताएँ : एम.ए. ( हिन्दी ) ( 1960 ) , डी.फिल . ( हिन्दी - भाषाविज्ञान ) ( 1962 ) , डी.लिट् , ( हिन्दी भाषाविज्ञान ) ( 1967 ) ।

प्रोफेसर जैन ने भारत सरकार के केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के निदेशक , रोमानिया के बुकारेस्त विश्वविद्यालय के हिन्दी के विजिटिंग प्रोफेसर तथा जबलपुर के विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिन्दी एवं भाषाविज्ञान विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष के रूप में कार्य किया तथा हिन्दी के अध्ययन अध्यापन एवं अनुसन्धान तथा हिन्दी के प्रचार - प्रसार विकास के क्षेत्रों में विश्व स्तर पर योगदान दिया है । प्रोफेसर जैन ने भारत सरकार के योजना आयोग के शिक्षा प्रभाग के सदस्य के रूप में कार्य किया । अनेक मन्त्रालयों की राजभाषा सलाहकार समितियों के सदस्य रहे ।

 25 से अधिक विश्वविद्यालयों के पी - एच . डी . एवं डी . लिट् . उपाधियों के लिए प्रस्तुत शताधिक शोध - प्रबन्धों का परीक्षण कार्य किया । अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों , परिसंवादों एवं संगोष्ठियों की अध्यक्षता की अथवा मुख्य व्याख्यान दिए ।

सम्मान

उत्तर प्रदेश सरकार का ' साहित्य भूषण पुरस्कार ' , भारतीय शिक्षा परिषद् , उत्तर प्रदेश द्वारा साहित्य वाचस्पति , डॉक्टर भीमराव अम्बेदकर विश्वविद्यालय , आगरा से ' ब्रज विभूति सम्मान ' , भारतीय राजदूतावास ,     बुकारेस्त ( रोमानिया ) बुकारेस्त विश्वविद्यालय में हिन्दी शिक्षण में योगदान के लिए ' स्वर्ण पदक ' ।

प्रमुख पुस्तकें

परिनिष्ठित हिन्दी का ध्वनिग्रामिक अध्ययन , परिनिष्ठित हिन्दी का रूपग्रामिक अध्ययन , अन्य भाषा शिक्षण , भाषा एवं भाषा विज्ञान , सूरदास एवं सूरसागर की भाव योजना , विश्वचेतना एवं सर्वधर्म सम्भाव , भगवान महावीर एवं जैन दर्शन , विश्व शान्ति एवं अहिंसा आदि

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