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Akbar-Hard Back

Author: Shazi Zaman
ISBN: 9788126729524
Edition: 2016, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
Special Price ₹679.15 Regular Price ₹799.00
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9788126729524
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''हिन्दू गाय खाएँ, मुसलमान सूअर खाएँ...” 3 मई, 1578 की चाँदनी रात को कोई भी हिन्दुस्तान के बादशाह अबुल मुज़फ़्फ़र जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर की इस बात को समझ नहीं पाया। इसीलिए उस वक़्त उनकी इस कैफ़ि‍यत को 'हालते अजीब’ कहा गया। सत्ता के शीर्ष पर खड़ा ये बादशाह अपनी ज़‍िन्दगी में कभी कोई जंग नहीं हारा। लेकिन अब एक बहुत बड़ी और ताक़तवर सत्ता उसके सब्र का इम्तिहान ले रही थी। बादशाह अकबर का संयम टूट रहा था और उनकी ज़‍िन्दगी का सबसे बड़ा संघर्ष शुरू होने को था।

कई रोज़ पहले लगभग पचास हज़ार शाही फ़ौजियों ने सल्तनत की सरहद के क‍़रीब एक बहुत बड़ा शिकारी घेरा बाँधा था। बादशाह अकबर के पूर्वज अमीर तैमूर और चंगेज़ ख़ान के तौर-तरीक़े के मुताबिक़ ये घेरा पल-पल कसता गया और अब वो वक़्त आ पहुँचा जब शिकार बादशाह सलामत के पहले वार के लिए तैयार था। लेकिन उस मुक़ाम पर आकर बादशाह अकबर ने एक हैरतअंगेज़ क़दम उठा लिया...

ये उपन्यास लेखक ने बाज़ार से दरबार तक के ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर रचा है। बादशाह अकबर और उनके समकालीन के दिल, दिमाग़ और दीन को समझने के लिए और उस दौर के दुनियावी और वैचारिक संघर्ष की तह तक जाने के लिए शाज़ी ज़माँ ने कोलकाता के इंडियन म्यूजि़यम से लेकर लन्दन के विक्टोरिया एंड ऐल्बर्ट तक बेशुमार संग्रहालयों में मौजूद अकबर की या अकबर द्वारा बनवाई गई तस्वीरों पर ग़ौर किया, बादशाह और उनके क़रीबी लोगों की इमारतों का मुआयना किया और 'अकबरनामा’ से लेकर 'मुन्तख़बुत्तवारीख़’, 'बाबरनामा’, 'हुमायूँनामा’ और 'तजि्करातुल वाक़यात’ जैसी किताबों का और जैन और वैष्णव सन्तों और ईसाई पादरियों की लेखनी का अध्ययन किया। इस खोज में 'दलपत विलास’ नाम का अहम दस्तावेज़ सामने आया जिसके गुमनाम लेखक ने 'हालते अजीब’ की रात बादशाह अकबर की बेचैनी को क़रीब से देखा। इस तरह बनी और बुनी दास्तान में एक विशाल सल्तनत और विराट व्यक्तित्व के मालिक की जद्दोजहद दर्ज है। ये वो शख़्स‍ियत थी जिसमें हर धर्म को अक़्ल की कसौटी पर आँकने के साथ-साथ धर्म से लोहा लेने की हिम्मत भी थी। इसीलिए तो इस शक्तिशाली बादशाह की मौत पर आगरा के दरबार में मौजूद एक ईसाई पादरी ने कहा, ''ना जाने किस दीन में जिए, ना जाने किस दीन में मरे।”

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Language Hindi
Binding Hard Back, Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2016
Edition Year 2016, Ed. 1st
Pages 342p
Price ₹799.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14 X 3
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Shazi Zaman

Author: Shazi Zaman

शाज़ी ज़माँ

शाज़ी ज़माँ दिल्ली में पैदा हुए; सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज, दिल्ली, से इतिहास में स्नातक हुए। लगभग साढ़े तीन दशक से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकार हैं। इस अर्से में वो दूरदर्शन, ज़ी न्यूज़, बीबीसी लन्दन, आज तक और स्टार न्यूज़ से जुड़े, एबीपी न्यूज़ नेटवर्क के समूह सम्पादक रहे और पीटीआई के डायरेक्टर, वीडियो सर्विसेज़। राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल के सम्पादकों की शीर्ष संस्था ब्रॉडकास्ट एडिटर्ज़ एसोसिएशन के संस्थापक अध्यक्ष भी रहे हैं। दो प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों—फ़िल्म एंड टेलीविज़न इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया, पुणे और इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मास कम्यूनिकेशन की कार्यकारी परिषद के सदस्य रह चुके हैं। ‘अकबर’ उपन्यास इनकी सर्वाधिक चर्चित कृति है जो हिन्दी-अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में उपलब्ध है। ‘प्रेमगली’ नाम से एक विलक्षण औपन्यासिक शृंखला के तीन मोड़ (पहला, उल्टा, अंधा) क्रमश: ‘प्रेम गली अति साँकरी’, ‘जिस्म जिस्म के लोग’ और ‘झिलमिल’ नाम से प्रकाशित हैं। अंग्रेज़ी में दो और किताबें हैं—‘अकबर द ग्रेट सीईओ’ और ‘ऐलिगेटर एंड द स्टेप्लर एंड अदर मैजिकल टेल्ज़’।

साहित्यिक लेखन के लिए उन्हें हिन्दी अकादमी, दिल्ली का गद्य विधा सम्मान मिला। अपनी ज़िन्दगी के कुछ साल लन्दन और मुम्बई में गुज़ारने के बाद वे फिर दिल्ली में बस गए। इस समय पीटीआई वीडियो सेवा के सम्पादक हैं।

सम्पर्क : [email protected]

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