आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी आलोचना के अधिनायक आचार्य हैं। बीसवीं शताब्दी की आलोचना और साहित्येतिहास लेखन में जितना आचार्य शुक्ल को विभिन्न मत-मतान्तरों के तहत पक्ष-विपक्ष में उद्धृत किया गया है उतना किसी दूसरे आलोचक और इतिहासकार को नहीं। शुक्ल जी ने हिन्दी आलोचना और इतिहास को एक जाग्रत सामाजिक-साहित्यिक दिशाबोध प्रदान किया। वे सच्चे अर्थों में एक लोकधर्मी प्रगतिशील आलोचक थे।
शुक्ल जी की पहचान एक विचारपरक, दृष्टि-सजग, वैज्ञानिक चेतना सम्पन्न निबन्धकार की है। उनके निबन्धों का वितान व्यापक है। साहित्य, कला, धर्म, भाषा, संस्कृति, राजनीति, अर्थनीति, समाज-चिन्ता, राष्ट्रबोध इत्यादि सभी विषयों पर उन्होंने विचारपूर्ण, अर्थगर्भित निबंधों/लेखों की रचना की है।
गद्य विधा में निबन्ध को महत्वपूर्ण विचार विनिमय के एक गम्भीर माध्यम के रूप में स्थापित करने का श्रेय आचार्य शुक्ल को है। शुक्ल जी के द्वारा विविध विषयों पर लिखे श्रेष्ठ साहित्यिक और वैचारिक निबंधों का चयन इस पुस्तक का प्रेय है। संकलित निबंधों में शुक्ल जी के शास्त्र और समाज दोनों का निदर्शन अपने मुकम्मल परिपाक में एक साथ मिलता है।
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Hard Back, Paper Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Satyaprakash Mishra |
| Edition Year | 2010 |
| Pages | 322p |
| Publisher | Lokbharti Prakashan |
| Dimensions | 18 X 12 X 1 |