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Aacharya Shukla Ka Itihas Padhte Huye

Author: Bachchan Singh
Edition: 2025, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Radhakrishna Prakashan
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Aacharya Shukla Ka Itihas Padhte Huye

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‘आचार्य शुक्ल का इतिहास पढ़ते हुए’ साहित्यालोचना की श्रेणी में एक अलग ढंग की पुस्तक है। हिन्दी साहित्य के मानक इतिहास के रूप में प्रतिष्ठित आचार्य शुक्ल की पुस्तक को ‘साहित्येतिहास-लेखन की अत्यन्त प्रौढ़ और प्रगतिशील विरासत’ मानते हुए डॉ. बच्चन सिंह यह भी कहते हैं कि अभी भी अनेक प्रश्न हैं जो उत्तर की माँग करते हैं, बहुत-से बिन्दु है जिन पर विचार किया जाना चाहिए।

वे कहते हैं कि शुक्ल जी पहले व्यक्ति हैं जिनके हाथों हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन के लिए एक सुसंगत आधार और उसका पैटर्न तैयार हुआ। इसके लिए उन्होंने जो केन्द्रीय बिन्दु रखा, वह है ‘लोक प्रवृत्ति’, जिसे उन्होंने जनता की चित्तवृत्ति कहा। लेकिन वे इस तथ्य के प्रति भी सजग थे कि जिस चित्तवृत्ति का प्रतिफलन साहित्य में हुआ, उसका सरोकार शिक्षित जन से है।

डॉ. बच्चन सिंह आचार्य शुक्ल के बाद आचार्य द्विवेदी के काम को ही उल्लेखनीय मानते हैं, इसलिए इस पुस्तक में दोनों ही विद्वानों के इतिहास-सम्बन्धी कामों पर अकसर साथ में बात करते हैं, जिससे पाठक के रूप में हम और भी लाभान्वित होते हैं। यह पुस्तक आचार्य शुक्ल लिखित इतिहास को पढ़ने के लिए वृहत्तर भूमि तैयार करती है, और अन्य उपलब्ध साहित्येतिहास-ग्रंथों का भी परिचय देती चलती है। 

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back, Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2025
Edition Year 2025, Ed. 1st
Pages 136p
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 1.5
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Bachchan Singh

Author: Bachchan Singh

बच्चन सिंह

बच्चन सिंह का जन्म 2 जुलाई, 1919 को जौनपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला से उन्होंने शिक्षा प्राप्त की।

आलोचना के क्षेत्र में उनका योगदान इन पुस्तकों के रूप में उपलब्ध है—‘क्रान्तिकारी कवि निराला’, ‘नया साहित्य’, ‘आलोचना की चुनौती’, ‘हिन्दी नाटक’, ‘रीतिकालीन कवियों की प्रेम-व्यंजना’, ‘बिहारी का नया मूल्यांकन’, ‘आलोचक और आलोचना’, ‘आधुनिक हिन्दी आलोचना के बीज शब्द’, ‘साहित्य का समाजशास्त्र और रूपवाद’, ‘आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास’, ‘भारतीय और पाश्चात्य काव्यशास्त्र का तुलनात्मक अध्ययन तथा हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास’। कथाकार के रूप में उन्होंने ‘लहरें और कगार’, ‘सूतो व सूतपुत्रो’ वा (उपन्यास) तथा ‘कई चेहरों के बाद’ (कहानी-संग्रह) की रचना की। ‘प्रचारिणी पत्रिका’ के लगभग एक दशक तक सम्‍पादक रहे।

5 अप्रैल, 2008 को उनका निधन हुआ। 

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