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Vallabhacharya : Jivan Aur Darshan

Edition: 2025, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Lokbharti Prakashan
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Vallabhacharya : Jivan Aur Darshan

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भारत की सन्त-परम्परा में आचार्य वल्लभ का नाम अद्वितीय तेजस्विता और करुणा से आलोकित है। उन्होंने शुद्धाद्वैत के अद्भुत दर्शन के माध्यम से भक्ति को केवल साधना नहीं बल्कि जीवन का स्वाभाविक और सहज भाव बना दिया। कृष्ण-प्रेम को केन्द्र में रखते हुए उन्होंने 'सेवा' को साधना का सर्वोच्च रूप माना, और वैष्णव भक्तिधारा को नई जीवनदृष्टि प्रदान की।
'वल्लभाचार्य: जीवन और दर्शन' आचार्य वल्लभ के जीवन-प्रसंगों, विचार-यात्रा और दर्शन-सिद्धान्तों का समग्र और सन्तुलित विवेचन प्रस्तुत करती है। लेखक ने ऐतिहासिक स्रोतों, प्रासंगिक ग्रन्थों और परम्परागत वैष्णव-आख्यानों का गहन अध्ययन कर, वल्लभाचार्य के व्यक्तित्व और विचारों को जीवन्त रूप में सामने रखा है।
साधकों के लिए यह ग्रन्थ आध्यात्मिक प्रेरणा का स्रोत है, और शोधकर्ताओं के लिए प्रामाणिक सन्दर्भ का भंडार। सहज भाषा, प्रामाणिक सामग्री और भावपूर्ण शैली- तीनों का संगम इस कृति को विशेष बनाता है।
यह पुस्तक केवल जीवनचरित नहीं बल्कि उस जीवन्त-दर्शन की यात्रा है जो मनुष्य को ईश्वर से, और ईश्वर को अपने भक्त से सहज प्रेम के सूत्र के माध्यम से जोड़ देती है।

More Information
Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2025
Edition Year 2025, Ed. 1st
Pages 152p
Publisher Lokbharti Prakashan
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Vinamra Sen Singh

Author: Vinamra Sen Singh

विनम्र सेन सिंह

विनम्र सेन सिंह का जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जनपद में 15 नवम्बर, 1988 को हुआ। आरम्भिक शिक्षा आजमगढ़ से। स्नातक इलाहाबाद विश्वविद्यालय तथा स्नातकोत्तर वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय से। दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से 'विवेकी राय के कथेतर गद्य में आंचलिकता और लोकजीवन' पर शोध कार्य। 2016 से 2018 तक बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में अध्यापन। वर्तमान में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर। साहित्यिक संस्था 'नया परिमल' के संस्थापक एवं सचिव तथा 'नया परिमल' पत्रिका के सम्पादक ।
'मार्क्सवादी आलोचना का विकास' पहली पुस्तक । 'अपना भारत देश महान', 'विवेकी राय: आंचलिकता और लोक जीवन', 'कलम आज उनकी जय बोल' मौलिक पुस्तकें। 'बादलों को आईना समझो' चर्चित काव्य-संग्रह। 'श्यामल घट: अमृत कलश' का सम्पादन। 'रामचरित उपाध्याय रचनावली' एवं 'काली मिट्टी पर पारे की रेखा' का सह-सम्पादन। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में शोध आलेख, कविताएँ, कहानियाँ एवं ललित निबन्ध प्रकाशित।
ई-मेल : [email protected]

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