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Utpeediton Ke Vimarsh

Edition: 2025, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
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Utpeediton Ke Vimarsh

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आदिवासी समाज को ज्यादातर रोमांटिक दृष्टि से देखा गया है। सिर्फ उनके हितैषी गैर-आदिवासी कार्यकर्ताओं और विद्वानों द्वारा ही नहीं, बल्कि खुद कुछ आदिवासियों द्वारा भी। कुछ आदिवासी साहित्यकार अपने विमर्श में आदिवासी समाज का जैसा सुन्दर, सर्वांगपूर्ण चित्र खींचते हैं, उस चित्र का खुद उन्हीं के द्वारा लिखी हुई कहानियों और उपन्यास में व्यक्त यथार्थ से कोई मेल नहीं बैठता; दोनों के बीच दूरी और अन्तर्विरोध दिखाई देता है। विमर्श में यह दावा किया जाता है कि दुनिया की सारी समस्याओं का हल आदिवासी समाज दर्शन से ही निकलेगा जबकि आदिवासी खुद कई समस्याओं से घिरे हुए हैं और अपनी ही समस्याओं को हल नहीं कर पा रहे हैं। ऐसा आदिवासी-विमर्श भी एक अतिवाद ही है। जैसे एक अतिवाद यह है कि हमें आदिवासियों का उद्धार करना है, वैसे ही दूसरा अतिवाद यह है कि आदिवासी से ही सबका उद्धार होगा। आदिवासी दर्शन के प्रवक्ता आदिवासी समाज की उन वास्तविकताओं को नहीं देखते, उन कमजोरियों को नहीं देखते जिनके खिलाफ लड़कर आदिवासियों को सचेत करने की जरूरत है। उलटे कभी-कभी ये कमियाँ भी उनकी नजर में गौरवपूर्ण बन जाती हैं। यह एक तरह की मनोवैज्ञानिक क्षतिपूर्ति है। उदाहरण के लिए कुछ लोग कहते हैं कि श्रम आदिवासी जीवन का बहुत बड़ा मूल्य है। यह बात दलितों के प्रसंग में भी कुछ विद्वानों ने कही है। सचाई यह है कि आर्थिक और शैक्षणिक दृष्टि से जितने भी कमजोर और पिछड़े हुए समाज हैं—जिनमें आदिवासी और दलित भारत में मुख्य हैं—उन सबमें श्रम करने का लगभग सारा बोझ स्त्रियों के सिर पर डाल दिया गया। श्रम उनके पुरुषों को भी करना पड़ता है, लेकिन पुरुषों के जिम्मे सिर्फ कुछ एक महत्त्वपूर्ण काम होते हैं तथा उनका बहुत-सा समय सोने, तमाखू पीने, दारू पीने, जुआ खेलने या स्थानीय राजनीति करने जैसे कामों में खर्च होता है। चाहे बर्मा की सीमा पर बसे मिजो आदिवासियों का समाज हो अथवा तिब्बत की सीमा पर बसे भोटियों का समाज हो—सभी आदिवासी समाजों में स्त्रियों को ज्यादा-से-ज्यादा काम करना पड़ता है।

—इसी पुस्तक से

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Language Hindi
Binding Hard Back, Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2025
Edition Year 2025, Ed. 1st
Pages 280p
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 2
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Vir Bharat Talwar

Author: Vir Bharat Talwar

वीर भारत तलवार

वीर भारत तलवार का जन्म 20 सितम्बर, 1947 को जमशेदपुर, झारखंड में हुआ। उन्होंने बी.एच.यू. से एम.ए. किया और जे.एन.यू. से पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में दो बार फेलो रहे। जे.एन.यू. में 24 वर्ष अध्यापन किया।

उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं—‘किसान राष्ट्रीय आन्दोलन और प्रेमचन्द : 1918-22’, ‘रस्साकशी’, ‘राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द : प्रतिनिधि संकलन’, ‘राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द’, ‘सामना : रामविलास शर्मा की विवेचन-पद्धति और मार्क्सवाद तथा अन्य निबन्ध’, ‘नक्सलबाड़ी के दौर में’, ‘झारखंड के आदिवासियों के बीच’, ‘झारखंड आन्दोलन के दस्तावेज’ (दो खंड), ‘झारखंड में मेरे समकालीन’, ‘बगावत और वफादारी : नवजागरण के इर्द-गिर्द’। पटना से ‘फिलहाल’ (1972-74), धनबाद से ‘शालपत्र’ (1977-78) और राँची से ‘झारखंड वार्ता’ (1977-78) का सम्पादन-प्रकाशन किया।

उन्हें ‘भगवान बिरसा पुरस्कार’ (1989) से सम्मानित और ‘झारखंड रत्न’ (2003) की उपाधि से विभूषित किया गया है।

ई-मेल : [email protected] 

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