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Singh Senapati-Hard Cover

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9788119989171
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राहुल सांकृत्यायन के ऐतिहासिक उपन्यासों में ‘सिंह सेनापति’ का विशेष स्थान है। इसमें उस वैशाली की ढाई हजार साल पूर्व की ऐतिहासिक गाथा को लिपिबद्ध किया गया है, जिसे गणतंत्र की जननी माना जाता है।

इस उपन्यास में राहुल दिखलाते है कि गणतांत्रिक अथवा प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था से भारत का परिचय हजारों साल पहले हो चुका था। वैशाली के निवासियों ने, आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व अपने लिए गणतांत्रिक व्यवस्था का आविष्कार कर लिया था और उसको सफलतापूर्वक संचालित किया था। ऐतिहासिक तथ्यों के जरिये वे इस कथा को न सिर्फ जीवन्तता बल्कि प्रामाणिकता भी प्रदान करते हैं।

उपन्यास की कथा युद्ध और प्रेम का आधार लेकर आगे बढ़ती है, जिसमें तत्कालीन युग और जीवन को सूक्ष्मता से चित्रित किया गया है। साथ ही उस समय के सामाजिक-सांस्कृतिक-नैतिक मूल्यबोधों के बीच ​स्त्रियों की आजादी, बराबरी, भाई-चारा आदि को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है। परिणामत: यह कृति अपने ऐतिहासिक परिधि को लाँघकर सार्वकालिक प्रासंगिकता प्राप्त कर लेती है। 

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back, Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2024
Edition Year 2026, Ed. 2nd
Pages 224p
Price ₹895.00
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 1.5
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Rahul Sankrityayan

Author: Rahul Sankrityayan

राहुल सांकृत्यायन

राहुल सांकृत्यायन का जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के पन्दहा गाँव में 9 अप्रैल, 1893 को हुआ था। मूर्धन्य और अन्तरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त विद्वान राहुल सांकृत्यायन साधु, बौद्ध भिक्षु थे, यायावर थे, इतिहासकार और पुरातत्त्ववेत्ता थे, नाटककार और कथाकार थे। वे जुझारू स्वतंत्रता-सेनानी, किसान-नेता, जन-जन के प्रिय नेता भी थे।

उन्होंने धर्म, संस्कृति, दर्शन, विज्ञान, समाज, राजनीति, इतिहास, पुरातत्त्व, भाषा-शास्त्र, संस्कृत ग्रंथों की टीकाएँ, अनुवाद और इसके साथ-साथ रचनात्मक लेखन करके हिन्दी को इतना कुछ दिया कि हम सदियों तक उस पर गर्व कर सकते हैं। उन्होंने जीवनियाँ और संस्मरण भी लिखे और अपनी आत्मकथा भी। अनेक दुर्लभ पांडुलिपियों की खोज और संग्रहण के लिए व्यापक भ्रमण भी किया।

उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं—‘वोल्गा से गंगा’, ‘घुमक्कड़-शास्त्र’, ‘मेरी तिब्बत यात्रा’, ‘मेरी यूरोप यात्रा’, ‘किन्नर देश में’, ‘मध्य एसिया का इतिहास’, ‘मानव समाज’, ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’, ‘दर्शन दिग्दर्शन’, ‘राहुल वाङ्मय’।

उन्हें 1958 में ‘मध्य एसिया का इतिहास’ के लिए ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ से पुरस्कृत किया गया। भारत सरकार ने 1963 में उन्हें ‘पद्म भूषण’ से अलंकृत किया।

14 अप्रैल, 1963 को उनका निधन हुआ। 

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