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Ghumakkad Swami-Paper Back

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9789347265327
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‘घुमक्कड़ स्वामी’ बाबा हरिशरणानन्द का जीवन-वृत्त है जिसे राहुल सांकृत्यायन ने जीवनी के साथ-साथ यात्रा-वृत्तान्त का रूप देते हुए लिखा है।

स्वामी हरिशरणानन्द का जन्म 1889 में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ जो कानपुर में व्यापार करता था। मात्र पन्द्रह वर्ष की उम्र में उन्होंने कुछ साधुओं के साथ गृह-त्याग कर दिया जो एक अथक, खोजी और जिज्ञासु यात्रा का आरम्भ था।

योग-साधना से शुरू होकर उनका यह सफ़र स्वतंत्रता-आन्दोलन में भागीदारी से होते हुए आयुर्वेद में शोध तक चलता रहा, फिर 1941 में बावन वर्ष की आयु में वे गृहस्थ हुए।

बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी स्वामी हरिशरणानन्द ने हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों की यात्राएँ भी कीं। वे एक विज्ञान-प्रेमी और दृष्टिवान सन्त थे। रू‌ढ़िवादी कर्मकांड और पंडों आदि के पाखंड को उजागर करते हुए उन्होंने ज्ञान के मार्ग का अवगाहन किया।

इस प्रसिद्ध पुस्तक में राहुल जी उनकी जीवन-यात्रा को उस समय के नगरों, व्यवसायों, आध्यात्मिक परम्पराओं, साधु-सन्तों की जीवनचर्या, आश्रमों-मठों के वातावरण और आयुर्वेद की गहरी जानकारियाँ साझा करते हुए लिखते हैं।

19वीं-20वीं सदी का भारत इसमें अपने सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहलुओं के साथ साक्षात दिखता है। 

More Information
Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2026
Edition Year 2026, Ed. 1st
Pages 200p
Price ₹250.00
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 20 X 13 X 1.5
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Rahul Sankrityayan

Author: Rahul Sankrityayan

राहुल सांकृत्यायन

राहुल सांकृत्यायन का जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के पन्दहा गाँव में 9 अप्रैल, 1893 को हुआ था। मूर्धन्य और अन्तरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त विद्वान राहुल सांकृत्यायन साधु, बौद्ध भिक्षु थे, यायावर थे, इतिहासकार और पुरातत्त्ववेत्ता थे, नाटककार और कथाकार थे। वे जुझारू स्वतंत्रता-सेनानी, किसान-नेता, जन-जन के प्रिय नेता भी थे।

उन्होंने धर्म, संस्कृति, दर्शन, विज्ञान, समाज, राजनीति, इतिहास, पुरातत्त्व, भाषा-शास्त्र, संस्कृत ग्रंथों की टीकाएँ, अनुवाद और इसके साथ-साथ रचनात्मक लेखन करके हिन्दी को इतना कुछ दिया कि हम सदियों तक उस पर गर्व कर सकते हैं। उन्होंने जीवनियाँ और संस्मरण भी लिखे और अपनी आत्मकथा भी। अनेक दुर्लभ पांडुलिपियों की खोज और संग्रहण के लिए व्यापक भ्रमण भी किया।

उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं—‘वोल्गा से गंगा’, ‘घुमक्कड़-शास्त्र’, ‘मेरी तिब्बत यात्रा’, ‘मेरी यूरोप यात्रा’, ‘किन्नर देश में’, ‘मध्य एसिया का इतिहास’, ‘मानव समाज’, ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’, ‘दर्शन दिग्दर्शन’, ‘राहुल वाङ्मय’।

उन्हें 1958 में ‘मध्य एसिया का इतिहास’ के लिए ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ से पुरस्कृत किया गया। भारत सरकार ने 1963 में उन्हें ‘पद्म भूषण’ से अलंकृत किया।

14 अप्रैल, 1963 को उनका निधन हुआ। 

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