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Shrikrishnacharitra

Edition: 2025, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Radhakrishna Prakashan
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Shrikrishnacharitra

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श्रीकृष्णचरित्र बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय की मूलतः बांग्ला में इसी नाम से रचित कालजयी कृति का अनुवाद है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण के वास्तविक चरित्र को ऐतिहासिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है। गहन शोध और तर्कपूर्ण विश्लेषण के साथ, बंकिमचन्द्र ने श्रीकृष्ण को केवल एक पौराणिक नायक के रूप में नहीं बल्कि एक आदर्श मानव, दूरद्रष्टा राजनयिक और अलौकिक ज्ञान-सम्पन्न दार्शनिक के रूप में चित्रित किया है।

लगभग 130 वर्ष पहले रची गई इस पुस्तक में भगवान श्रीकृष्ण के जीवन को कालानुक्रम में प्रस्तुत किया गया है। महाभारत, प्रमुख पुराणों तथा अन्य धार्मिक सन्दर्भों के प्रामाणिक उद्धरणों से समृद्ध यह पुस्तक प्राचीन और मान्य ग्रन्थों के आधार पर श्रीकृष्ण के जीवन, व्यक्तित्व-कृतित्व और उनकी शिक्षाओं को पुनर्परिभाषित करती है, जो भारतीय संस्कृति और नैतिकता के मूल्यों को सहजता से स्पष्ट करती हैं।

इस कालजयी रचना की सामग्री तथा मूल शैली को बनाए रख कर, अपरिहार्य संशोधनों के साथ, इस अनूदित संस्करण को आधुनिक पाठकों के लिए अधिक प्रासंगिक बनाया गया है।

निस्सन्देह यह कृति साहित्य, इतिहास, अध्यात्म, दर्शन और भारतीय संस्कृति में रुचि रखने वालों के लिए नितान्त पठनीय और अवश्य संग्रहणीय है। 

More Information
Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Jagannath Prasad Chaturvedi
Editor Ashok Kumar Sharma
Publication Year 2025
Edition Year 2025, Ed. 1st
Pages 320p
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 21.5 X 14 X 1.5
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Bankimchandra Chattopadhyay

Author: Bankimchandra Chattopadhyay

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय

राष्ट्रीय गीत ‘वन्देमातरम्’ के रचयिता बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय का जन्म 1838 को उत्तरी चौबीस परगना के कन्थलपाड़ा में एक समृद्ध बंगाली परिवार में हुआ था।

सन् 1857 में बी.ए. उतीर्ण करने के पश्चात् 1869 में क़ानून की डिग्री हासिल की। प्रेसिडेंसी कालेज से बी.ए. की उपाधि लेनेवाले ये पहले भारतीय थे। शिक्षा के उपरान्त डिप्टी मजिस्ट्रेट के पद पर आपकी नियुक्ति हो गई। कुछ समय तक बंगाल सरकार के सचिव-पद पर कार्यरत थे और ‘रायबहादुर’ तथा ‘सी.आई.ई.’ की उपाधि हासिल की। सन् 1891 में सरकारी नौकरी से रिटायर हुए।

आपकी पहचान बांग्ला कवि, उपन्यासकार और पत्रकार के रूप में है। प्रथम प्रकाशित रचना ‘राजमोहन’स वाइफ़’ थी। प्रथम प्रकाशित बांग्लाकृति 'दुर्गेशनन्दिनी' मार्च, 1865 में। अगली रचना 'कपालकुंडला' 1866 में प्रकाशित। ‘आनंदमठ’, ‘देवी चौधरानी’, ‘मृणालिनी’, ‘कृष्‍णकान्‍त का वसीयतनामा’ आपके प्रसिद्ध उपन्‍यास हैं। आपकी कविताएँ ‘ललिता’ और ‘मानस’ नामक संग्रह में प्रकाशित हुई। आपने धर्म, सामाजिक और समसामयिक मुद्दों पर आधारित अनेक निबन्ध भी लिखे।

सन् 1894 में निधन।

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