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Rajyog-Hard Cover

ISBN: 9789395328869
Edition: 2026, Ed. 2nd
Language: Hindi
Publisher: Radhakrishna Prakashan - Remadhav
Special Price ₹596.25 Regular Price ₹795.00
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9789395328869
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योग विद्या के आचार्य कहते हैं कि धर्म का आधार पूर्वकालीन अनुभूतियाँ जरूर हैं, लेकिन धार्मिक होने के लिए इन अनुभूतियों से स्वयं गुजरना अनिवार्य है। सिर्फ कहे हुए का अनुकरण करके कोई धार्मिक नहीं हो सकता। धर्म के सत्यों का जब तक आप स्वयं अनुभव नहीं कर लेते तब तक धर्म की बात करना व्यर्थ है, और उसके नाम पर खून बहाना केवल हिंसा।

योग ही वह माध्यम है जिसके द्वारा हम उन अनुभूतियों को स्वयं अनुभूत और अर्जित कर सकते हैं। विवेकानन्द इसे एक व्यावहारिक और वैज्ञानिक प्रणाली मानते हैं। जिस तरह वैज्ञानिक बाह्य वस्तुओं पर परीक्षण करता है, उसी तरह योग का परीक्षण-स्थल मन है, और उसका साधन भी।

यह पुस्तक राजयोग के सिद्धांतों को सरल और सहज भाषा में व्याख्यायित करती है। पुस्तक के पहले भाग में न्यूयॉर्क में छात्रों को योग की शिक्षा देने के लिए स्वामी विवेकानंद ने जो वक्तव्य दिए थे, वे संकलित हैं और दूसरे भाग में पतंजलि के योग सूत्र, उन सूत्रों के अर्थ और उन पर संक्षिप्त टीका शामिल है। 

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back, Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2025
Edition Year 2026, Ed. 2nd
Pages 192p
Price ₹795.00
Publisher Radhakrishna Prakashan - Remadhav
Dimensions 21.5 X 14 X 1
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Swami Vivekanand

Author: Swami Vivekanand

स्वामी विवेकानन्द

स्वामी विवेकानन्द आधुनिक भारत के अग्रणी आध्यात्मिक-धार्मिक नेता और समाज-सुधारक थे। उनका जन्म 12 जनवरी, 1863 को कलकत्ता के एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। उन्होंने कलकत्ता मेट्रोपॉलिटन स्कूल और प्रेसीडेंसी कॉलेज, कलकत्ता से शिक्षा ग्रहण की। 1880 में वे केशवचन्द्र सेन और देवेन्द्रनाथ ठाकुर की अगुआई वाले साधारण ब्रह्म समाज से जुड़े लेकिन 1881 में रामकृष्ण परमहंस से मुलाकात के बाद उनके शिष्य बन गए। 1886 में रामकृष्ण के देहान्त के बाद उन्होंने संन्यास ग्रहण कर पूरे भारत का भ्रमण किया और भारतीय जनगण की यथार्थ स्थिति को अपनी आँखों देखा। 1893 में 11 सितम्बर को उन्होंने शिकागो, अमेरिका में आयोजित विश्व धर्म-संसद को सम्बोधित किया, इस सम्बोधन ने पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया। 1896 में उन्होंने न्यूयॉर्क में वेदान्त सोसाइटी का गठन किया। लगभग ढाई वर्ष के अपने अमेरिका-प्रवास के दौरान उन्होंने कई पाश्चात्य देशों में जाकर व्याख्यान दिए। भारत लौटने के बाद 1897 में 1 मई को उन्होंने अपने गुरुभाइयों के साथ मिलकर रामकृष्ण की शिक्षाओं के प्रचार और मानव-सेवा के उद्देश्य से रामकृष्ण मिशन की स्थापना की।

उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं—‘राजयोग’, ‘कर्मयोग’, ‘ज्ञानयोग’, ‘भक्तियोग’, ‘धर्मतत्त्व’, ‘शिक्षा’, ‘संस्कृति और समाजवाद’, ‘मेरे गुरु’, ‘भारतीय नारी’, ‘भगवान बुद्ध तथा उनका सन्देश’ आदि।

4 जुलाई, 1902 को बेलूर मठ, बेलूर में उनका निधन हो गया। 

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