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Vaishali Ki Virasat-Hard Cover

ISBN: 9789377377281
Edition: 2026, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
Special Price ₹596.25 Regular Price ₹795.00
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वैशाली को गणतंत्र की जननी कहा जाता है। गणतंत्र की स्थापना यहाँ यूनान से भी पहले हो चुकी थी। छठी शताब्दी ईसा-पूर्व की कुछ शताब्दियाँ वैशाली के उत्कर्ष का काल थीं। उस समय यह एक शक्तिशाली महाजनपद की राजधानी थी। अजातशत्रु द्वारा वृज्जिसंघ पर विजय एवं वैशाली के मगध में विलय के बाद भी इस नगर का महत्त्व बना रहा।

राहुल सांकृत्यायन के शब्दों में, वैशाली के विस्तृत इतिहास ने पहले-पहल भारतीयों को बतलाया कि हम सदा निरंकुश राजाओं के जुओं को ही नहीं ढोते रहे, बल्कि हमारे यहाँ भी अपने प्रजातंत्र थे। वैशाली प्रजातंत्र बहुत शक्तिशाली था। यह ज्ञान की स्थली भी रही। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है, “वैशाली ज्ञान, कर्म और राजशक्ति की त्रिवेणी रही है। ब्राह्मण, बौद्ध और जैन-परम्परा की त्रिवेणी रही है। ज्ञानशक्ति, आत्मशक्ति और धनशक्ति की त्रिवेणी रही है।”

बौद्ध धर्म की कई महत्त्वपूर्ण घटनाएँ भी वैशाली से सम्बन्धित हैं। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है बौद्ध संघ में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति। वैशाली में ही बुद्ध की  मौसी महाप्रजापति गौतमी संघ में प्रवेश पानेवाली पहली भिक्षुणी बनीं। वैशाली की प्रसिद्ध राजनर्तकी अम्बपाली संघ में प्रवेश पानेवाली दूसरी महिला थी।

‘वैशाली की विरासत’ में इसी वैशाली की खोज की गई है और इसका माध्यम बने हैं हिन्दी के साहित्यकारों, बौद्धिकों और इतिहासज्ञों द्वारा लिखे वे सूचनापरक आलेख जो उन्होंने वैशाली से अपने अनुराग के कारण, वहाँ के ऐतिहासिक महत्त्व से अभिभूत होकर लिखे। पुस्तक में उन व्यक्तित्वों पर केन्द्रित आलेख भी शामिल किये गए हैं जिनका सम्बन्ध इस क्षेत्र से रहा है।

वैशाली के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्त्व पर रोशनी डालने वाली यह पुस्तक एक सन्दर्भ ग्रन्थ के रूप में संग्रहणीय है। 

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2026
Edition Year 2026, Ed. 1st
Pages 316p
Price ₹795.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 20.5 X 13.5 X 2
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Vandana Rag

Author: Vandana Rag

वन्दना राग

वन्दना राग मूलत: बिहार के सीवान ज़‍िले से हैं। जन्म इन्दौर मध्य प्रदेश में हुआ और पिता की स्थानान्तरण वाली नौकरी की वजह से भारत के विभिन्न शहरों में स्कूली शिक्षा पाई। 1990 में दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. किया। पहली कहानी ‘हंस’ में 1999 में छपी और फिर निरन्‍तर लिखने और छपने का सिलसिला चल पड़ा। तब से कहानियों की चार किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं—‘यूटोपिया’, ‘हिजरत से पहले’, ‘ख़यालनामा’ और ‘मैं और मेरी कहानियाँ’। इसके अलावा अनेक अनुवाद कर चुकी है जिनमें प्रख्यात इतिहासकार ई.जे. हॉब्सबाम की किताब ‘एज ऑफ़ कैपिटल’ का अनुवाद ‘पूँजी का युग’ शीर्षक से किया है। यदा-कदा अख़बारों में सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर लिखती रहती हैं। ‘बिसात पर जुगनू’ इनका पहला उपन्यास है।

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