विजयदेव नारायण साही निरपेक्ष और आत्मस्थ ब्रह्माण्ड में मनुष्य की लघुता को भली भांति देख सकते हैं, और काल के उस अग्निकमल को भी जिसमें सब भस्म हो जाता है। इस नश्वरता में अर्थ की सतत तलाश उनकी कविता के केन्द्र में है, चाहे वह अर्थ अपनी तलाश को पहचानने में ही निहित हो, सृष्टि के वास्तविक स्वरुप को देखने में हो, वर्तमान क्षण के सौन्दर्य को जी लेने में हो अथवा मूल्यों को परिभाषित करने तथा उनकी चौकीदारी करने में हो। इन सभी को वे सत्य के रूप में देखते हैं, और सत्य को पहचानने का यह सधा हुआ और सघन बौद्धिक प्रयास उनकी कविता को विलक्षण बनाता है। आन्तरिक और बाह्य लय उनकी कविता की विशेषता है जो गीत और ग़ज़ल से होते हुए काव्यात्मक एकालाप में भी व्यक्त होती है, और विराट शब्दावली से सटीक शब्द चुन लेने की उनकी क्षमता सूक्ष्म अभिव्यंजनाओं को गुंजरित कर सघनता को पुष्ट करती है।
कहीं बहुत गहरे स्तर पर साही एक नागरिक हैं। मूल्यों की परिभाषा उनके लिए सामाजिक सन्दर्भ रखती है और बहुत हद तक उनकी कविता भी एक सामाजिक ज़िम्मेदारी का निर्वहन करती है। उनकी कविताओं की इस समग्र प्रस्तुति में कविताएँ लेखन-क्रम में व्यवस्थित हैं एवं पूर्व में अप्रकाशित कुछ कविताएँ भी इसमें शामिल हैं। पुस्तक में शामिल विस्तृत सम्पादकीय और उसके अलावा कुछ अन्य आलोचनात्मक लेख व परिशिष्ट में संकलित उनकी पुस्तकों से जुड़ी सामग्री इस संचयन को एक सम्पूर्ण अध्ययन बना देती है।
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Paper Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Susmita Sahi Srivastava |
| Publication Year | 2026 |
| Edition Year | 2026, Ed. 1st |
| Pages | 616p |
| Publisher | Lokbharti Prakashan |
| Dimensions | 21.5 X 14 X 4 |