Rachna Ka Antrang

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Rachna Ka Antrang
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अर्थशास्त्र जाननेवाले कहते हैं कि गाँव की तरक्‍़क़ी हो गई है। समाजशास्त्र के विद्वान कहते हैं कि रिश्तों में दरार आ गई है। गाँव के लोग कहते हैं कि अब वह बात नहीं रहीं। बहुत उदास-उदास लगता है। यहाँ रहने का मन नहीं होता। लब्बोलुबाब यह कि इतनी उदास, मनहूस और क़र्ज़ में डूबी तरक्‍़क़ी। बैंकों की मदद से हमारे गाँव में तीन लोगों ने ट्रैक्टर ख़रीदे और तीनों के आधे खेत बिक गए। ट्रैक्टर औने-पौने दाम में बेचने पड़े। पता नहीं क़र्ज़ चुकता हुआ कि नहीं? पंचायती राज में लोकतंत्र को गाँवों तक ले जाने का कार्यक्रम बना। फिर तो, अपहरण, हत्याएँ और मुकदमेबाज़ी। सारे के सारे गाँव थानों और कचहरियों में जाकर क़ानून की धाराएँ रटने लगे।... —'अस्सी की एक शाम' से
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Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 2020
Edition Year 2020, 1st Ed.
Pages 167p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Lokbharti Prakashan
Dimensions 22 X 14 X 1
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Editorial Review

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Devendra

Author: Devendra

देवेन्द्र

जन्म : 1 जनवरी 1958; गाजीपुर जनपद के पिपनार गाँव में।

ढेर सारा समय लखीमपुर में अध्यापन और अब लखनऊ में।

प्रकाशन : ‘शहर कोतवाल की कविता’, ‘समय बे-समय’, ‘नालन्‍दा पर गिद्ध’। इसी बीच समकालीन हिन्दी कविता पर आलोचना की एक पुस्तक भी प्रकाशित हुई।

सम्मान : 1996 में प्रकाशित पहले कहानी-संग्रह ‘शहर कोतवाल की कविता’ पर ‘इंदु शर्मा कथा सम्मान’, ‘यशपाल कथा सम्मान’ और सावित्री देवी फाउंडेशन का ‘हिन्दी कथा सम्मान’।

सम्प्रति : गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, छत्तीसगढ़ में हिन्दी के प्रोफ़ेसर।

सम्पर्क : 569 च/498, प्रेम नगर, आलमबाग़, लखनऊ।

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