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Purnamadah

Author: Saroj Kaushik
Edition: 2025, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Radhakrishna Prakashan
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Purnamadah

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प्रेम की न कोई भाषा होती है, न परिभाषा, न सीमाएँ उसे सीमित करती हैं, न दूरियाँ उसे ओझल करती हैं, वह दूरी जीवन और मृत्यु भी क्यों न हों!

‘पूर्णमिदम्’ के बाद सरोज कौशिक का यह उपन्यास ‘पूर्णमदः’; अलग-अलग होते हुए भी ये दोनों उपन्यास एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। वह अध्यात्म के आलोक में प्रकाशमान, तो यह जीवन के संघर्षों ने बीच के पवित्र दीप को अपने सचेत आत्मबोध की ओट में बचाते हुए एक सघन यात्रा।

‘पूर्णमदः’ में पीड़ा है, अतीत के दुखते घाव हैं, स्मृति में कौंधती विविधवर्णी छवियाँ हैं, चहुँओर व्याप्त कालिमा में अपने अन्तस की पवित्रता को निष्कलंक रखते अपने मूल्यों को बचाने का संघर्ष है; और जीवन तथा समाज में मनुष्य की आत्मा को कचोटतीं, खोखला करतीं अपूर्णताओं के बरक्स पूर्ण को बचाने और अगली पीढ़ियों के लिए संरक्षित रखने की कामना है।

भावनाओं के सघन चित्रों से परिपूर्ण एक पठनीय औपन्यासिक कृति।

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Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2025
Edition Year 2025, Ed. 1st
Pages 128p
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 1.5
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Saroj Kaushik

Author: Saroj Kaushik

सरोज कौशिक

सरोज कौशिक का जन्म 6 अक्टूबर, 1940 को फिरोजपुर, पंजाब में हुआ। उन्होंने कराची, बम्बई और कलकत्ता में पढ़ाई की। समाज-सेवा, संगीत और लिखने-पढ़ने का संस्कार माँ से मिला और पिता से निर्लिप्तता। ‘कोलकी’, ‘पूर्णमिदम्’ उनके प्रशंसित उपन्यास हैं। उन्होंने बाँग्ला के प्रसिद्ध लेखक सुनील गंगोपाध्याय के बहुचर्चित उपन्यास ‘धूलिबसन’ का हिन्दी अनुवाद ‘उत्तर संधान’ नाम से किया है। ‘हंस’, ‘रविवार’ सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं।

सम्पर्क :  [email protected] 

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