समय का चक्र पूरे संसार में जनसामान्य के हितों के विरुद्ध घूम रहा है। ऐसे में मुक्ति की सांस्कृतिक कार्यवाही का सबसे मुखर अस्त्र, दीनों की साथी और आन्दोलनों का प्राण कविताएँ बनी हैं। दुख और तनावों से घिरा कवि मायूस नहीं है बल्कि अपनी सबसे शक्तिशाली भूमिका में है। ऐसा ही चुप्पा किस्म का अलग-थलग दिखने वाला एक कवि बरबस अपनी कविताओं के कारण हमारा ध्यान खींचता है—हेमंत देवलेकर। हेमंत की कविताएँ सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक सन्दर्भों के साथ बिना ‘कवितापन’ खोये संवाद करती हैं। वे संवेदनाओं को आकार में ढालते हैं। उनकी कविताओं के टटके बिम्ब, भाषिक ताज़गी, हरियारी महक बार-बार पढ़े जाने की ज़िद्द लिए सगेपन के साथ हमारे भीतर उतरती है।
हेमंत के यहाँ पीड़ा और शक्ति के ज़िन्दा बिम्ब चमत्कार बनकर नहीं बल्कि अन्तर्मन को बेधने आते हैं। उनका कविमन और कविकर्म ‘सामूहिकता’ और ‘सहअस्तित्व’ से बँधा है। कवि जानता है कि इन दो शब्दों में ही वैश्विक सांस्कृतिक विरासत और दुनिया को बचा लेने का शऊर है।
हेमंत अदबी नहीं प्रकृति भाषा के पक्षधर हैं। इनकी कविताएँ सामान्य प्रसंगों से जुड़ी हुई होकर भी हमें गहरी मनोवैज्ञानिक सच्चाइयों तक लेकर जाती हैं, हमें हमारे समय के पतझड़िया मौसम और भूरे रंग से रूबरू कराती हैं, परन्तु अवसाद में नहीं ढकेलती। बकौल कवि ‘मेरी कलम की स्याही में... खून भी उपलब्ध होता है और दवाएँ भी’।
मौजूदा दौर में हेमंत की इतनी बेधक और मारक, ज़िन्दगी से भरी, धूप के टुकड़े को आँसुओं से नम रखने वाली कविताएँ, विसंगति और त्रासदी के बीच एक ‘भरोसे’ की तरह अपने सघनतम रूप में संगी-साथी की तरह पाठकों के बीच उतरेंगी। इसी विश्वास और इसी आस के साथ पुनः ‘हर पेड़ कहीं दूर फिर अपना पेड़ बसाना चाहता है।’
—शशिकला राय
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Paper Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 2025 |
| Edition Year | 2025, Ed. 1st |
| Pages | 120p |
| Publisher | Radhakrishna Prakashan |
| Dimensions | 21.5 X 14 X 1 |