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Patrakarita Mein Anuwad

Author: Priyadarshan
Editor:
Edition: 2016, Ed. 3rd
Language: Hindi
Publisher: Radhakrishna Prakashan
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Patrakarita Mein Anuwad

अनुवाद की बात आते ही हमें दो भाषाओं का परिदृश्य ध्यान में आता है। अनुवाद की ज़रूरत केवल दो भाषाओं के सन्दर्भ में ही होऐसा ज़रूरी नहीं है। अनुवाद के कई ऐसे आयाम होते हैं जिन पर हम आम तौर पर ग़ौर नहीं करते। दो विरोधी दर्शन और विचार रखनेवालों के बीच संवाद के लिए भी अनुवाद की ज़रूरत होती है। अनुवाद के ऐसे ग़ैर-पारम्परिक अर्थ और प्रसंग को छोड़ भी देंतो भी पत्रकारिता के क्षेत्र में अनुवाद का अहम स्थान है।

हिन्दी के प्रति प्रेमराष्ट्र-गौरव की भावनाआत्म-सम्मान जैसे सराहनीय और वांछनीय आदर्शों के सशक्त हिमायती होने के बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अख़बारों द्वारा अन्तरराष्ट्रीय परिदृश्य के निरन्तरअद्यतन और सही ढंग से अंकन के लिए अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद की ज़रूरत अभी भी बरकरार है। अनुवाद की कला कठिन है क्योंकि दो भिन्न भाषाओं की अभिव्यक्ति शैली भी भिन्न होती है। हर भाषा का एक अपना चरित्र होता है और उस चरित्र के कारण भाषा की शैली की विशिष्टता होती है। विद्वान लेखकों द्वारा तैयार इस पुस्तक के ज़रिए इस कला को विस्तार देने और सँवारने की कोशिश की गई है। पत्रकारिता से जुड़े हर व्यक्ति के लिए यह उपयोगी पुस्तक है।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Publication Year 1991
Edition Year 2016, Ed. 3rd
Pages 108p
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 22 X 14 X 1.2
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Priyadarshan

Author: Priyadarshan

प्रियदर्शन

प्रियदर्शन का जन्म 24 जून, 1968 को राँची में हुआ। उन्होंने राँची विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी में एम.ए. की पढ़ाई करने के बाद उसी शहर से पत्रकारिता की शुरुआत की।

उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं—‘ज़िन्दगी लाइव’ (उपन्यास); ‘बारिश, धुआँ और दोस्त’, ‘उसके हिस्से का जादू’, ‘हत्यारा और अन्य कहानियाँ’, ‘सहेलियाँ और अन्य कहानियाँ’ (कहानी-संग्रह); ‘यह जो काया की माया है’, ‘नष्ट कुछ भी नहीं होता’, ‘चयनित कविताएँ’ (कविता-संग्रह); ‘ग्लोबल समय में गद्य’, ‘ग्लोबल समय में कविता’ (आलोचना); ‘इतिहास गढ़ता समय’, ‘भारत की घड़ी’, ‘समाज, संस्कृति और संकट’, ‘जो हिंदुस्तान हम बना रहे हैं’, ‘हमारी भाषा हमारा देश’ (विचार); ‘दुनिया मेरे आगे’, ‘क्या ये शहर तुम्हारा है? (संस्मरण); ‘नए दौर का नया सिनेमा’ (फिल्म); ‘ख़बर-बेख़बर’ (पत्रकारिता); ‘आपकी जेलें टूट जाएँगी एक दिन’ (ट्विटर ग़ज़लें); ‘बेटियाँ मन्नू की’ (नाटक)।

उनका कविता-संग्रह ‘नष्ट कुछ भी नहीं होता’ मराठी में और उपन्यास ‘ज़िन्दगी लाइव’ अंग्रेज़ी में अनूदित हैं। उन्होंने सलमान रुश्दी और अरुंधति‍ रॉय की कृतियों सहित कई किताबों का अनुवाद और सम्पादन भी किया है। विविध राजनैतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर तीन दशक से नियमित विविधतापूर्ण लेखन और हिन्दी की सभी महत्त्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन।

उन्हें कहानी के लिए पहला ‘स्पन्दन सम्मान’ और टीवी पत्रकारिता के लिए हिन्दी अकादमी, दिल्ली के सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।

ई-मेल : [email protected]

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