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Paltaniya

Edition: 2026, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Radhakrishna Prakashan
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Paltaniya

स्वतंत्र भारत में नैतिक और सामाजिक मूल्यों का क्षरण चन्द्रकिशोर जायसवाल के कथाकार मन को अत्यन्त व्यथित करता है। अपने उपन्यासों में उन्होंने अलग-अलग कोणों से पतन की इस आँधी को चिह्नित किया है, उसके घटक तत्त्वों पर उँगली भी रखी है और ऐसे पात्रों का सृजन भी किया है जो चारित्रिक विनाश की इस धारा को रोकना चाहते हैं; वापस मोड़ना चाहते हैं।

पलटनिया खा-खाकर कुछ से कुछ हो जाने वाले लोगों को कठघरे में खड़ा करनेवाले इस उपन्यास ‘पलटनिया’ में उन्होंने बिहार के कोसी अंचल की गरीबी, रोजी-रोटी के लिए मजदूरों के पलायन और बीसवीं सदी के नौवें दशक में परवान चढ़े अपहरण उद्योग जैसे अनेक दृश्य-अदृश्य मसलों पर अपना ध्यान केन्द्रित किया है।

बहुकेन्द्रीय कथा-वितान में रचा गया यह उपन्यास अत्यन्त सूक्ष्म ब्योरों के साथ ग्रामीण समाज में ऊँची जातियों की दबंगई और आर्थिक-सामजिक रूप से पिछड़े-कुचले तबकों की कहानी कहता है और उन तमाम विडम्बनाओं पर उँगली रखता है जो ताकत के लिए व्याकुल मौजूदा समाज की विशेषताएँ बन चुकी हैं। वह समाज जो खुलकर कहता है कि ‘रोटी खाई चक्कर से, दुनिया चले मक्कर से।’

यह उपन्यास इतिहास लिखने की कथा भी है। कहानी के आरम्भ में ही कथाकार कहता है, “हत्यारों के आगे तो इतिहास हमेशा से सिर झुकाता आया है।” आज जो कुछ नहीं है वह कैसे अपनी चालाकियों से सब कुछ बन जाता है और इतिहास में दाखिल होने की माँग करने लगता है, यह उपन्यास इस प्रक्रिया की बहुत बारीकी से पड़ताल करता है। एक समूचे अंचल के जीवन की वास्तविक तसवीर खींचने वाला संग्रहणीय उपन्यास। 

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Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2026
Edition Year 2026, Ed. 1st
Pages 640p
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 21.5 X 14 X 4
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Chandrakishore Jaiswal

Author: Chandrakishore Jaiswal

चन्द्रकिशोर जायसवाल

चन्द्रकिशोर जायसवाल का जन्म 15 फरवरी, 1940 को बिहार के मधेपुरा जिले के बिहारीगंज में हुआ। आपने पटना विश्वविद्यालय, पटना से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर शिक्षा हासिल की और अरसे तक अध्यापन करने के बाद भागलपुर अभियंत्रणा महाविद्यालय, भागलपुर से प्राध्यापक के रूप में सेवानिवृत्त हुए।

आपकी प्रमुख कृतियाँ हैं—‘गवाह गैरहाजिर’, ‘जीबछ का बेटा बुद्ध’, ‘शीर्षक’, ‘चिरंजीव’, ‘माँ’, ‘दाह’ ‘पलटनिया’, ‘सात फेरे’, ‘मणिग्राम’, ‘भट्ठा’, ‘दुखग्राम’ (उपन्यास); ‘मैं नहिं माखन खायो’, ‘मर गया दीपनाथ’, ‘हिंगवा घाट में पानी रे!’, ‘जंग’, ‘नकबेसर कागा ले भागा’, ‘दुखिया दास कबीर’, ‘किताब में लिखा है’, ‘आघातपुष्प’, ‘तर्पण’, ‘जमीन’, ‘खट्टे नहीं अंगूर’, ‘हम आजाद हो गए!’, ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’ (कहानी-संग्रह); ‘शृंगार’, ‘सिंहासन’, ‘चीर-हरण’, ‘रतजगा’, ‘गृह-प्रवेश’, ‘रंग-भंग’ (नाटक); ‘आज कौन दिन है?’, ‘त्राहिमाम’, ‘शिकस्त’, ‘जबान की बन्दिश’ (एकांकी)।

आप ‘रामवृक्ष बेनीपुरी सम्मान’ (हजारीबाग), ‘बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान’ (आरा), ‘आनन्द सागर कथाक्रम सम्मान’ (लखनऊ), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद का ‘साहित्य साधना सम्मान’ (पटना) और बिहार सरकार का जननायक ‘कर्पूरी ठाकुरी सम्मान’ (पटना) से सम्मानित हैं।

आपके उपन्यास ‘गवाह गैरहाजिर’ पर राष्ट्रीय फ़िल्म विकास ​निगम द्वारा निर्मित फ़िल्म ‘रूई का बोझ’ और कहानी ‘हिंगवा घाट में पानी रे!’ पर दूरदर्शन द्वारा निर्मित फ़िल्में काफी चर्चित रही हैं। ‘रूई का बोझ’ नेशनल फ़िल्म फेस्टिवल पैनोरमा (1998) के लिए चयनित हुई थी और अनेक अन्तराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सवों में प्रदर्शित हो चुकी है।

ई-मेल : [email protected]

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