भनटा को मालूम था कि हिंगवा घाट पर पुल नहीं बनेगा, फिर भी वह अपने खीसे के चार रुपये चन्दे में दे आया। भला क्यों? क्योंकि उसे लगा कि नेताजी लोग दिल्ली से आए हैं, बोल रहे हैं पुल बनेगा, तो दे दिया चन्दा। पेट भरने के लिए आदमी क्या-क्या नहीं करता! लेकिन सच बात ये है कि यह उसने इसलिए कहा कि लोग मजाक न बनाएँ। तब तो उसे यकीन हो ही गया था कि पुल बनेगा।
भारतीय ग्रामीण जीवन के बहुआयामी यथार्थ की व्यापक समझ रखने वाले चन्द्रकिशोर जायसवाल ग्राम्य जन के मनोविज्ञान को भी बखूबी समझते हैं और उसे अपनी कहानियों-उपन्यासों में सम्प्रेषणीय ढंग से पुनर्रचित करते हुए ग्रामीण समाज की एक पूरी तसवीर हमारे सामने रखते हैं।
‘हिंगवा घाट में पानी रे’ उनकी ऐसी ही चर्चित कहानियों का संकलन है जिनमें उन्होंने गाँव के गरीबों और अमीरों के बीच के जटिल ताने-बाने के साथ उनके मनो-मस्तिष्क की संरचना को भी एक साहित्यिक की सहानुभूति और एक समाजविज्ञानी जैसी तटस्थता से बयान किया है।
संग्रह की ‘चौदह अगस्त’ अपनी ज़बान, बयान और कथ्य में एक बड़े क़द की कहानी है। भारत की गुलामी के आखिरी चौदह अगस्त की ये कहानी आजादी बाद के भारत की विडम्बना को थोड़े अलग ढंग से रेखांकित करती है। संग्रह में इसके अलावा संकलित कहानियाँ हैं — ‘बाँट-बखरा’, ‘परदा’, ‘पिया-दुलरी’ और ‘अपहरण’, जो अपने-अपने पात्रों और परिवेश के साथ पाठकों को अत्यन्त प्रिय रही हैं।
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Paper Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 2026 |
| Edition Year | 2026 |
| Pages | 176 |
| Publisher | Radhakrishna Prakashan |
| Dimensions | 19.8 X 12.9 X 1.2 |