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Hingwa Ghat Mein Pani Re

Edition: 2026
Language: Hindi
Publisher: Radhakrishna Prakashan
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Hingwa Ghat Mein Pani Re

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भनटा को मालूम था कि हिंगवा घाट पर पुल नहीं बनेगा, फिर भी वह अपने खीसे के चार रुपये चन्दे में दे आया। भला क्यों? क्योंकि उसे लगा कि नेताजी लोग दिल्ली से आए हैं, बोल रहे हैं पुल बनेगा, तो दे‌ दिया चन्दा। पेट भरने के लिए आदमी क्या-क्या नहीं करता! लेकिन सच बात ये है कि यह उसने इसलिए कहा कि लोग मजाक न बनाएँ। तब तो उसे यकीन हो ही गया था कि पुल बनेगा।

भारतीय ग्रामीण जीवन के बहुआयामी यथार्थ की व्यापक समझ रखने वाले चन्द्रकिशोर जायसवाल ग्राम्य जन के मनोविज्ञान को भी बखूबी समझते हैं और उसे अपनी कहानियों-उपन्यासों में सम्प्रेषणीय ढंग से पुनर्रचित करते हुए ग्रामीण समाज की एक पूरी तसवीर हमारे सामने रखते हैं।

‘हिंगवा घाट में पानी रे’ उनकी ऐसी ही चर्चित कहानियों का संकलन है जिनमें उन्होंने गाँव के गरीबों और अमीरों के बीच के जटिल ताने-बाने के साथ उनके मनो-मस्तिष्क की संरचना को भी एक साहित्यिक की सहानुभूति और एक समाजविज्ञानी जैसी तटस्थता से बयान किया है।

संग्रह की ‘चौदह अगस्त’ अपनी ज़बान, बयान और कथ्य में एक बड़े क़द की कहानी है। भारत की गुलामी के आखिरी चौदह अगस्त की ये कहानी आजादी बाद के भारत की विडम्बना को थोड़े अलग ढंग से रेखांकित करती है। संग्रह में इसके अलावा संकलित कहानियाँ हैं — ‘बाँट-बखरा’, ‘परदा’, ‘पिया-दुलरी’ और ‘अपहरण’, जो अपने-अपने पात्रों और परिवेश के साथ पाठकों को अत्यन्त प्रिय रही हैं।

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Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2026
Edition Year 2026
Pages 176
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 19.8 X 12.9 X 1.2
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Chandrakishore Jaiswal

Author: Chandrakishore Jaiswal

चन्द्रकिशोर जायसवाल

चन्द्रकिशोर जायसवाल का जन्म 15 फरवरी, 1940 को बिहार के मधेपुरा जिले के बिहारीगंज में हुआ। आपने पटना विश्वविद्यालय, पटना से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर शिक्षा हासिल की और अरसे तक अध्यापन करने के बाद भागलपुर अभियंत्रणा महाविद्यालय, भागलपुर से प्राध्यापक के रूप में सेवानिवृत्त हुए।

आपकी प्रमुख कृतियाँ हैं—‘गवाह गैरहाजिर’, ‘जीबछ का बेटा बुद्ध’, ‘शीर्षक’, ‘चिरंजीव’, ‘माँ’, ‘दाह’ ‘पलटनिया’, ‘सात फेरे’, ‘मणिग्राम’, ‘भट्ठा’, ‘दुखग्राम’ (उपन्यास); ‘मैं नहिं माखन खायो’, ‘मर गया दीपनाथ’, ‘हिंगवा घाट में पानी रे!’, ‘जंग’, ‘नकबेसर कागा ले भागा’, ‘दुखिया दास कबीर’, ‘किताब में लिखा है’, ‘आघातपुष्प’, ‘तर्पण’, ‘जमीन’, ‘खट्टे नहीं अंगूर’, ‘हम आजाद हो गए!’, ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’ (कहानी-संग्रह); ‘शृंगार’, ‘सिंहासन’, ‘चीर-हरण’, ‘रतजगा’, ‘गृह-प्रवेश’, ‘रंग-भंग’ (नाटक); ‘आज कौन दिन है?’, ‘त्राहिमाम’, ‘शिकस्त’, ‘जबान की बन्दिश’ (एकांकी)।

आप ‘रामवृक्ष बेनीपुरी सम्मान’ (हजारीबाग), ‘बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान’ (आरा), ‘आनन्द सागर कथाक्रम सम्मान’ (लखनऊ), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद का ‘साहित्य साधना सम्मान’ (पटना) और बिहार सरकार का जननायक ‘कर्पूरी ठाकुरी सम्मान’ (पटना) से सम्मानित हैं।

आपके उपन्यास ‘गवाह गैरहाजिर’ पर राष्ट्रीय फ़िल्म विकास ​निगम द्वारा निर्मित फ़िल्म ‘रूई का बोझ’ और कहानी ‘हिंगवा घाट में पानी रे!’ पर दूरदर्शन द्वारा निर्मित फ़िल्में काफी चर्चित रही हैं। ‘रूई का बोझ’ नेशनल फ़िल्म फेस्टिवल पैनोरमा (1998) के लिए चयनित हुई थी और अनेक अन्तराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सवों में प्रदर्शित हो चुकी है।

ई-मेल : [email protected]

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