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Murdon Ka Tila-Hard Cover

Author: Rangeya Raghav
ISBN: 9788171193042
Edition: 2026, Ed. 6th
Language: Hindi
Publisher: Radhakrishna Prakashan
Special Price ₹845.75 Regular Price ₹995.00
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9788171193042
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भारत की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति का इतिहास मुअनजोदड़ो के उत्खनन में मिली सिन्धु घाटी की सभ्यता से शुरू होता है। इस सभ्यता का विकसित स्वरूप उस समय की ज्ञात किसी सभ्यता की तुलना में अधिक उन्नत है। प्रसिद्ध उपन्यासकार रांगेय राघव ने अपने इस उपन्यास ‘मुर्दों का टीला’ में उस आदि सभ्यता के संसार का सूक्ष्म चित्रण किया है। मोअन-जो-दड़ो सिन्धी शब्द है। उसका अर्थ है—मृतकों का स्थान अर्थात् ‘मुर्दों का टीला’।

‘मुर्दों का टीला’ शीर्षक इस उपन्यास में रांगेय राघव ने एक रचनाकार की दृष्टि से मोअन-जो-दड़ो का उत्खनन करने का प्रयास किया है। इतिहास की पुस्तकों में तो इस सभ्यता के बारे में महज़ तथ्यात्मक विवरण ही मिल पाते हैं। लेकिन रांगेय राघव के इस उपन्यास के सहारे हम सिन्धु घाटी सभ्यता के समाज की जीवित धड़कनें सुनते हैं।

सिन्धु घाटी सभ्यता का स्वरूप क्या था? उस समाज के लोगों की जीवन-व्यवस्था का स्वरूप क्या था? रीति-रिवाज कैसे थे? शासन-व्यवस्था का स्वरूप क्या था? इन प्रश्नों का इतिहाससम्मत उत्तर आप इस उपन्यास में पाएँगे। भारतीय उपमहाद्वीप की अल्पज्ञात आदि सभ्यता को लेकर लिखा गया यह अद्वितीय उपन्यास है। रांगेय राघव का यह उपन्यास प्राचीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति में प्रवेश का पहला दरवाज़ा है।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back, Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 1997
Edition Year 2026, Ed. 6th
Pages 342P
Price ₹995.00
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 22.3 X 14.5 X 3.2
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Rangeya Raghav

Author: Rangeya Raghav

रांगेय राघव

रांगेय राघव का जन्म 17 जनवरी, 1923 को आगरा, उत्तर प्रदेश में हुआ। उनका मूल नाम टी.एन.वी. आचार्य—तिरुमल्लै नंबकम् वीरराघव आचार्य था। उन्होंने सेंट जॉन्स कॉलेज, आगरा से 1944 में स्नातकोत्तर और 1949 में आगरा विश्वविद्यालय से ‘गुरु गोरखनाथ और उनका युग’ विषय पर पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। हिन्दी, अंग्रेजी, ब्रज और संस्कृत पर उनका असाधारण अधिकार था। 13 वर्ष की छोटी आयु में ही लिखना शुरू किया। 1942 में अकालग्रस्त बंगाल की यात्रा के बाद ‘तूफानों के बीच’ नाम से एक बहुचर्चित रिपोर्ताज लिखा। उन्हें चालीस साल से भी कम उम्र मिली इसके बावजूद कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, रिपोर्ताज के अतिरिक्त आलोचना, संस्कृति और सभ्यता पर जमकर काम किया और कुल मिलाकर 150 से अधिक पुस्तकें लिखीं। उन्होंने भारतेन्दु, कबीर, तुलसी, कृष्ण, बुद्ध, विद्यापति, गोरखनाथ और बिहारी जैसे रचनाकारों और व्यक्तित्वों को केन्द्र में रखकर कई रचनाएँ लिखीं। ‘मुर्दों का टीला’, ‘कब तक पुकारूँ’, ‘सीधा-सादा रास्ता’, ‘लोई का ताना’, ‘साम्राज्य का वैभव’ तथा ‘प्रगतिशील साहित्य के मापदंड’ उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं। अंग्रेजी और संस्कृत से बड़ी संख्या में अनुवाद भी किया। उन्हें ‘हिन्दुस्तानी अकादमी पुस्कार’, ‘डालमिया पुरस्कार’, ‘उत्तर प्रदेश शासन पुरस्कार’ और मरणोपरान्त ‘महात्मा गांधी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। 12 सितम्बर, 1962 को बम्बई में उनका निधन हुआ। 

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