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Chiwar

Author: Rangeya Raghav
Edition: 2025, Ed. 5th
Language: Hindi
Publisher: Radhakrishna Prakashan
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Chiwar

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उपन्यासकार रांगेय राघव ने ‘सीधा सादा रास्ता’ और ‘कब तक पुकारूँ’ जैसे समकालीन विषय-वस्तु पर आधारित उपन्यासों के साथ ऐतिहासिक उपन्यासों से भी हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया है। अपनी मार्क्सवादी विश्व-दृष्टि के आधार पर वे प्रत्येक विषय को अपने ख़ास नज़रिए से चित्रित करते हैं।

‘चीवर’ उनके प्रमुखतम ऐतिहासिक उपन्यासों में से एक है। इसमें उन्होंने हर्षवर्धन काल के पतनशील भारतीय सामन्तवाद को रेखांकित किया है। ब्राह्मण और बौद्ध मतों के परस्पर संघर्ष के साथ-साथ मालव गुप्तों, वर्धनों और मौखरियों के बीच राजनीतिक सत्ता के लिए होनेवाला संघर्ष भी हमें यहाँ दिखाई देता है।

भाषा के स्तर पर यह उपन्यास सिद्ध करता है कि शब्दावली अगर घोर तत्समप्रधान हो तब भी उसमें रस की सर्जना की जा सकती है—बशर्ते लेखनी किसी समर्थ रचनाकार के हाथ में हो। यह इस उपन्यास की प्रवहमान भाषा का ही कमाल है कि इसमें विचरनेवाले पात्र, वह चाहे राज्यश्री हो या हर्षवर्धन या कोई और हमारी स्मृति पर अंकित हो जाते हैं।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back, Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2004
Edition Year 2025, Ed. 5th
Pages 180p
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 1.5
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Rangeya Raghav

Author: Rangeya Raghav

रांगेय राघव

रांगेय राघव का जन्म 17 जनवरी, 1923 को आगरा, उत्तर प्रदेश में हुआ। उनका मूल नाम टी.एन.वी. आचार्य—तिरुमल्लै नंबकम् वीरराघव आचार्य था। उन्होंने सेंट जॉन्स कॉलेज, आगरा से 1944 में स्नातकोत्तर और 1949 में आगरा विश्वविद्यालय से ‘गुरु गोरखनाथ और उनका युग’ विषय पर पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। हिन्दी, अंग्रेजी, ब्रज और संस्कृत पर उनका असाधारण अधिकार था। 13 वर्ष की छोटी आयु में ही लिखना शुरू किया। 1942 में अकालग्रस्त बंगाल की यात्रा के बाद ‘तूफानों के बीच’ नाम से एक बहुचर्चित रिपोर्ताज लिखा। उन्हें चालीस साल से भी कम उम्र मिली इसके बावजूद कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, रिपोर्ताज के अतिरिक्त आलोचना, संस्कृति और सभ्यता पर जमकर काम किया और कुल मिलाकर 150 से अधिक पुस्तकें लिखीं। उन्होंने भारतेन्दु, कबीर, तुलसी, कृष्ण, बुद्ध, विद्यापति, गोरखनाथ और बिहारी जैसे रचनाकारों और व्यक्तित्वों को केन्द्र में रखकर कई रचनाएँ लिखीं। ‘मुर्दों का टीला’, ‘कब तक पुकारूँ’, ‘सीधा-सादा रास्ता’, ‘लोई का ताना’, ‘साम्राज्य का वैभव’ तथा ‘प्रगतिशील साहित्य के मापदंड’ उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं। अंग्रेजी और संस्कृत से बड़ी संख्या में अनुवाद भी किया। उन्हें ‘हिन्दुस्तानी अकादमी पुस्कार’, ‘डालमिया पुरस्कार’, ‘उत्तर प्रदेश शासन पुरस्कार’ और मरणोपरान्त ‘महात्मा गांधी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। 12 सितम्बर, 1962 को बम्बई में उनका निधन हुआ। 

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