यह डायरी है टीस की, दर्द की। वह टीस जो उम्र अपने पीछे छोड़ती चलती है; जिसे हम स्मृति की पोटली में बाँधे, अपने भीतर सँजोये-सँभाले जीवन की सड़क पर आगे बढ़ते रहते हैं। बचपन, स्कूल के दिन, वे साँवली गलियाँ जहाँ साँझ किसी अपने की तरह आती दिखती थी। अपने लोग, भाई, बहनें, पिता, अम्मा और सहेलियाँ, जिन्हें समय हमारे देखते-देखते अलग-अलग दुनियाओं में ले जाकर स्थापित कर देता है—अपने-अपने ढंग से बड़ा-बूढ़ा और अजनबी होने के लिए—इन सबसे जुड़ा कोई न कोई दर्द इस किताब में दर्ज है। कुछ इस अन्दाज में कि एक-एक शब्द जैसे उनको फिर से छू लेने को बढ़ा हुआ हाथ हो।
बेटियाँ—माँ की गोद जैसे अपने जाने-जिये आँगनों को छोड़ती हुईं; पराए आँगनों में उतरतीं डरतीं-कँपकँपातीं बहुएँ; बूढ़े होते, प्रतीक्षारत पिता, और हमारे सूखे पठार वर्तमान से वापस बुलाते, पुकारते वो बीते हुए दिन; कहते हुए कि लौट आओ, लौट आओ, आगे कुछ भी नहीं है। इस डायरी के पन्नों में वे ही दिन अपनी छोटे कंचों-सी आँखें खोले हमारी राह देख रहे हैं....
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Paper Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 2026 |
| Edition Year | 2026, Ed. 1st |
| Pages | 224p |
| Publisher | Rajkamal Prakashan |
| Dimensions | 20 X 13 X 1.5 |