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Ghar Se Ghar Tak

Author: Ushakiran Khan
Edition: 2024, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Radhakrishna Prakashan - Remadhav
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Ghar Se Ghar Tak

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उषाकिरण खान की कहानियाँ अधिकतर ग्रामीण परिवेश की हैं। ग्रामीण जीवन की मान्यताएँ उनके संस्कार-कुसंस्कार, उनके अन्दर की ऊर्जा से पाठकों को रू-ब-रू कराती उनकी कथाएँ सबको साथ लेकर चलती हैं। आधुनिक भाषा में जिन्हें दलित कहा जाता है उनके बीच रहनेवाली उषाकिरण खान की कहानियों में न तो दलितमुक्ति का पाखण्ड है न नारीमुक्ति का आडम्बर है।

साहित्यिक भाषा के होते हुए भी छोटे-छोटे वाक्यों में कथा लिखने के कारण सहज सुगम शैली में सब कुछ कह जाना उनकी विशेषता है।

उषाकिरण खान एक विदुषी महिला हैं। कहानी ही नहीं सांस्कृतिक, सामाजिक विषयों पर अपनी इतिहासप्रिय लेखनी का समर्थ परिचय देती हैं।

उषाकिरण के पात्र कल्पित नहीं होते; आप उन्हें इंगित कर खोज निकाल सकते हैं।

प्रस्तुत संग्रह की चुनिन्दा कथाओं में उनके अत्यन्त विपन्न कोशी तटबन्ध के गाँव की स्त्रियों के दु:ख हैं तो विदेश से आयी कन्या के सपनों के गाँव की त्रासदी भी। सामाजिक सद्भाव के प्रतीक की क्षीण आशा है तो तार-तार होती समरसता भी है।

यह तय है कि उषाकिरण खान की कथाओं में शिक्षित, अशिक्षित सभी जाति, वर्ग तथा धर्म की स्त्रियों की समीचीन कथा है—सृजनधर्मी स्त्रियों की कथा।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2024
Edition Year 2024, Ed. 1st
Pages 208p
Publisher Radhakrishna Prakashan - Remadhav
Dimensions 22.5 X 14 X 1.5
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Ushakiran Khan

Author: Ushakiran Khan

उषाकिरण खान

उषाकिरण खान हिन्दी और मैथिली की वरिष्ठ साहित्यकार हैं। उनका जन्म 24 अक्टूबर, 1945 को बिहार के लहेरियासराय (दरभंगा) में हुआ। पटना विश्वविद्यालय से इतिहास एवं पुरातत्त्व में स्नातकोत्तर तथा मगध विश्वविद्यालय से पी-एच.डी. करने के बाद लम्बे समय तक अध्यापन किया।

लेखन की शुरुआत 1977 से। ‘विवश विक्रमादित्य’, ‘दूबधान’, ‘गीली पाँक’, ‘कासवन’, ‘जलधार’, ‘जनम अवधि’, ‘घर से घर तक’, ‘खेलत गेंद गिरे यमुना में’, ‘मौसम का दर्द’ (कहानी संग्रह); ‘अगनहिंडोला’, ‘सिरजनहार’, ‘गई झूलनी टूट’, ‘फागुन के बाद’, ‘पानी की लकीर’, ‘सीमान्त कथा’, ‘रतनारे नयन’, ‘गहरी नदिया नाव पुरानी’ (उपन्यास); ‘कहाँ गए मेरे उगना’, ‘हीरा डोम’ (नाटक);  ‘प्रभावती : एक निष्कम्प दीप’, ‘मैं एक बलुआ प्रस्तर खंड’ (कथेतर गद्य); ‘सिय पिय कथा’ (खंडकाव्य) उनकी प्रमुख हिन्दी कृतियाँ हैं। मैथिली में प्रकाशित प्रमुख पुस्तकें हैं : ‘काँचहि बाँस’, ‘गोनू झा क्लब’, ‘सदति यात्रा’ (कहानी संग्रह); ‘अनुत्तरित प्रश्न’, ‘दूर्वाक्षत’, ‘हसीना मंजिल’, ‘भामती : एक अविस्मरणीय प्रेमकथा’, ‘पोखरि रजोखरि’, ‘मनमोहना रे’ (उपन्यास); ‘चानो दाई’, ‘भुसकौल बला’, ‘फागुन’, ‘एक्सरि ठाढ़ि’ (नाटक)।

दोनों भाषाओं में बच्चों के लिए भी उन्होंने कई पुस्तकें लिखी हैं। विभिन्न रचनाओं के उड़िया, बांग्ला, उर्दू एवं अंग्रेजी समेत अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुके हैं।

‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ (2010), ‘भारत भारती’ (2019) और ‘प्रबोध साहित्य सम्मान’ (2020) सहित अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार-सम्मान उन्हें प्रदान किए जा चुके हैं। वर्ष 2015 में उन्हें ‘पद्मश्री’ से विभूषित किया गया।
निधन : 12 फरवरी, 2024

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