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Bonn : Yadon Mein Basa Shahar

Author: Suhail Waheed
Edition: 2025, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
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Bonn : Yadon Mein Basa Shahar

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जर्मनी जिसे किसी भी मामले में किसी से भी कम होना मंजूर नहीं। मशीन और तकनीक वाला ही नहीं, कार्ल मार्क्स, हेनरिक हाइन, हीगेल और गोऐथे वाला जर्मनी। हिटलर वाला भी जर्मनी और ख़ूबसूरत आबोहवा वाला जर्मनी।

हवा इतनी साफ़ कि मुँह खोलकर निगल जाने को जी चाहता है, वह भी दिन में। और डिसिप्लिन ऐसा कि रात के सन्नाटे में भी कोई रेडलाइट क्रॉस नहीं करता। आदमी तो आदमी, कुत्ते को भी इतनी सख़्त ट्रेनिंग कि उसकी भी मजाल नहीं कि वह रेडलाइट पार कर जाए।

और खुलापन...कि अपने देश में इतना स्वच्छन्द प्यार तो घर में भी मुमकिन नहीं।

जर्मन रेडियो डायचे वैले, बॉन में बतौर सम्पादक काम करने गए लेखक का यह यात्रा-वृत्त सिर्फ़ जर्मनी के दैनिक जीवन और सांस्कृतिक मूल्यों के ही बारे में नहीं बताता, इसे पढ़ते हुए हमें यह बात बिना किसी संशय के स्वीकार्य लगने लगती है कि ज़िन्दगी को देखने-बरतने के तरीक़े और भी हो सकते हैं, और वे दुनिया में हैं।

पश्चिम से लौटकर अपने एशियाई रहन-सहन की मलामत, ख़ासकर भारत-पाकिस्तान में, आम-सी बात है, जो यह किताब नहीं करती। यह जर्मनी को, उसके समाज को अपने सजीव शब्द-चित्रों और एक अच्छे उपन्यास की तरह छोटे-छोटे ब्योरों में इतने पूरेपन के साथ हमारे सामने साकार करती है कि हम अपने दैनिक देसी रोज़मर्रा में यहाँ जकड़े पड़े रहते हुए भी कुछ देर को वहाँ होकर आ जाते हैं।

पत्रकार, कथाकार, सम्पादक सुहेल वहीद को कहन का यह जादू बेशक उर्दू की तरफ़ से मिला है, जो यहाँ इस सफ़रनामे में इतनी ख़ूबसूरती से खिल उठा है। वे देखे-सुने और महसूस किए को लिखने-बताने में कतर–ब्यौंत नहीं करते, क्योंकि ऐसा करने से ज़िन्दगी की तस्वीरें तो भरोसे लायक़ नहीं ही बनतीं। सो यहाँ सब कुछ सच्चा, प्यारा और यक़ीन के साथ महसूस करने क़ाबिल है।

यह कहने की तो बिल्कुल ज़रूरत नहीं कि आप इस किताब को उठाएँगे तो पढ़‌ने के बाद ही रखेंगे। 

More Information
Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2025
Edition Year 2025, Ed. 1st
Pages 270p
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 21.5 X 14 X 1
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Suhail Waheed

Author: Suhail Waheed

सुहेल वहीद

सुहेल वहीद ने उर्दू दैनिक ‘कौमी आवाज़’ से पत्रकारिता की शुरुआत की। हिन्दी दैनिक ‘नवभारत टाइम्स’ एवं ‘नई दुनिया’ में सम्पादकीय पदों पर रहे। जर्मन रेडियो डीडब्ल्यू (DW) में भी कार्य किया। यूपी सरकार की विख्यात उर्दू पत्रिका ‘नया दौर’ में सम्पादक रहे। पत्रकारिता की भाषा में दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.फ़िल., पी-एच.डी. किया। उर्दू में लिखी उनकी पुस्तकें हैं—‘सहाफती ज़बान’ (उर्दू पत्रकारिता की भाषा), ‘परस्तिश बर्क़ की’ (कहानी-संग्रह), ‘यादों की बरात’ (यात्रा-वृत्तान्त), ‘शमोएल अहमद की तख़्लीक़ियत’ (आलोचना), ‘उर्दू के असबियती अफ़साने’ (सम्पादन)। ​हिन्दी में प्रकाशित पुस्तकें हैं—‘तश्तरी’ (सम्पादन), ‘वर्चस्व’ : राजेश पांडेय (सम्पादन) विभिन्न हिन्दी-उर्दू साहित्यिक पत्रिकाओं में उनकी कहानियाँ, आलोचना, यात्रा-वृत्तान्त तथा सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर दर्जनों लेख प्रकाशित हैं। कई अनुवाद भी प्रकाशित हैं।

उन्हें ‘मिर्ज़ा असदुल्लाह ग़ालिब पुरस्कार’ 2014, यूपी उर्दू अकादमी के ‘पत्रकारिता पुरस्कार’ 2016 से सम्मानित किया गया है।

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