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Bharatiya Sabhyata Ki Nirmiti

Author: Bhagwan Singh
Edition: 2025, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
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Bharatiya Sabhyata Ki Nirmiti

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भारतीय सभ्यता की निर्मिति’ भारतीय सभ्यता के इतिहास की उस बड़ी कमी को दूर करने का सुचिन्तित प्रयास है, जो सभ्यता के निर्माताओं के बजाय भोक्ताओं को केन्द्र में रख कर लिखने से पैदा हुई है। वास्तव में भोक्ताओं को केन्द्र में रखकर लिखा गया इतिहास दमन के औजारों, हथियारों, संस्थाओं और वर्चस्व के रूपों का इतिहास होता है, जिसमें अर्थव्यवस्था और सामाजिक सम्बन्धों के बजाय अधिरचना को प्रमुखता दी जाती है। इससे इतिहास में समाज के वही तबके अनुल्लिखित रह जाते हैं जिनके बिना सभ्यता ही सम्भव नहीं हो पाती। यह समस्या केवल भारतीय सभ्यता के इतिहास की नहीं, बल्कि समूचे ‘सभ्य’ संसार की रही है। इस समस्या को ध्यान में रखते हुए यह पुस्तक इतिहास के उन अनदेखे-ओझल-पक्षों की सूक्ष्मता से और सप्रमाण विवेचना करती है, जिनके बिना भारतीय सभ्यता की महायात्रा से परिचित होना सम्भव नहीं है। 

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Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2025
Edition Year 2025, Ed. 1st
Pages 255p
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 21.5 X 14 X 1.5
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Bhagwan Singh

Author: Bhagwan Singh

भगवान सिंह

जन्म : 1931 में गोरखपुर जनपद के गगहा गाँव में। साहित्य की विविध विधाओं में लेखन। उनका शोधपरक लेखन इतिहास और भाषा के क्षेत्र में रहा है।

प्रकाशित कृतियाँ : ‘काले उजले टीले’ (1964); ‘महाभिषग’ (1973); ‘अपने-अपने राम’ (1992); ‘परम गति’ (1999); ‘उन्माद’ (2000); ‘शुभ्रा’ (2000); ‘अपने समानान्तर’ (1970); ‘इन्द्र धनुष के रंग’ (1996)।

शोधपरक रचनाएँ : ‘स्थान नामों का भाषावैज्ञानिक अध्ययन’ (अंशत: प्रकाशित, ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’, 1973); ‘आर्य-द्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता’ (1973); ‘हड़प्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य’—दो खंडों में (1987); ‘दि वेदिक हड़प्पन्स’ (1995); ‘भारत तब से अब तक’ (1996); ‘भारतीय सभ्यता की निर्मिति’ (2004); ‘भारतीय परम्‍परा की खोज’ (2011); ‘प्राचीन भारत के इतिहासकार’ (2011); ‘कोसम्‍बी : मिथक और यथार्थ’ (2011); ‘आर्य-द्रविड़ भाषाओं का अन्‍त:सन्‍बन्ध’ (2013); ‘इतिहास का वर्तमान’ (2016)।

सम्प्रति : 'ऋग्वेद की परम्परा’ पर धारावाहिक लेखन, 'नया ज्ञानोदय’ में।

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