Facebook Pixel

Bhago Nahin Duniya Ko Badlo-Paper Back

Special Price ₹224.25 Regular Price ₹299.00
25% Off
In stock
SKU
9789348157713
- +
Share:
Codicon

राहुल सांकृत्यायन का समूचा जीवन घुमक्कड़ी का था। भिन्न-भिन्न भाषा, साहित्य एवं प्राचीन संस्कृत-पाली-प्राकृत-अपभ्रंश आदि भाषाओं का अनवरत अध्ययन-मनन करने का अपूर्व वैशिष्ट्य उनमें था। उनके घुमक्कड़ जीवन के मूल में अध्ययन की प्रवृति ही सर्वोपरि रही।

राहुल जी जब जिसके सम्पर्क में गए, उसकी पूरी जानकारी हासिल की। जब वे साम्यवाद के क्षेत्र में गए, तो कार्ल मार्क्स, लेनिन, स्तालिन आदि के राजनीतिक दर्शन की पूरी जानकारी प्राप्त की। यही कारण है कि उनके साहित्य में जनता, जनता का राज्य और मेहनतकश मजदूरों का स्वर प्रबल और प्रधान है।

उनकी रचनाओं में प्राचीन के प्रति आस्था, इतिहास के प्रति गौरव और वर्तमान के प्रति सधी हुई दृष्टि का समन्वय देखने को मिलता है। यह केवल राहुल जी थे जिन्होंने प्राचीन और वर्तमान भारतीय साहित्य-चिन्तन को समग्रत: आत्मसात् कर हमें मौलिक दृष्टि देने का निरन्तर प्रयास किया।

‘भागा नहीं दुनिया का बदलो’ राहुल जी की अनुपम क्रान्तिकारी रचना है। यह कहानियों और उपन्यास के बीच की एक अनोखी राजनीतिक कथाकृति है। इस कृति की रचना का विशेष उद्देश्य यह है कि कम पढ़े-लिखे लोग राजनीति को समझ सकें। उन्हें अपनी अच्छाई-बुराई भी मालूम हो और उन्हें इसका भी ज्ञान हो कि राजनीति की दुनिया में कैसे-कैसे दाँव-पेंच खेले जाते हैं। राहुल-साहित्य में इस कृति का एक विशिष्ट स्थान है। 

More Information
Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2025
Edition Year 2025, Ed. 1st
Pages 264p
Price ₹299.00
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 21.5 X 14 X 1.5
Write Your Own Review
You're reviewing:Bhago Nahin Duniya Ko Badlo-Paper Back
Your Rating
Rahul Sankrityayan

Author: Rahul Sankrityayan

राहुल सांकृत्यायन

राहुल सांकृत्यायन का जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के पन्दहा गाँव में 9 अप्रैल, 1893 को हुआ था। मूर्धन्य और अन्तरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त विद्वान राहुल सांकृत्यायन साधु, बौद्ध भिक्षु थे, यायावर थे, इतिहासकार और पुरातत्त्ववेत्ता थे, नाटककार और कथाकार थे। वे जुझारू स्वतंत्रता-सेनानी, किसान-नेता, जन-जन के प्रिय नेता भी थे।

उन्होंने धर्म, संस्कृति, दर्शन, विज्ञान, समाज, राजनीति, इतिहास, पुरातत्त्व, भाषा-शास्त्र, संस्कृत ग्रंथों की टीकाएँ, अनुवाद और इसके साथ-साथ रचनात्मक लेखन करके हिन्दी को इतना कुछ दिया कि हम सदियों तक उस पर गर्व कर सकते हैं। उन्होंने जीवनियाँ और संस्मरण भी लिखे और अपनी आत्मकथा भी। अनेक दुर्लभ पांडुलिपियों की खोज और संग्रहण के लिए व्यापक भ्रमण भी किया।

उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं—‘वोल्गा से गंगा’, ‘घुमक्कड़-शास्त्र’, ‘मेरी तिब्बत यात्रा’, ‘मेरी यूरोप यात्रा’, ‘किन्नर देश में’, ‘मध्य एसिया का इतिहास’, ‘मानव समाज’, ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’, ‘दर्शन दिग्दर्शन’, ‘राहुल वाङ्मय’।

उन्हें 1958 में ‘मध्य एसिया का इतिहास’ के लिए ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ से पुरस्कृत किया गया। भारत सरकार ने 1963 में उन्हें ‘पद्म भूषण’ से अलंकृत किया।

14 अप्रैल, 1963 को उनका निधन हुआ। 

Read More
Books by this Author
New Releases
Back to Top