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Ye Shahar Lagai Mohe Ban-Hard Cover

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इस किताब के आख़िरी सफहे पर यह इबारत दर्ज है—

‘कहते हैं, रूहों की आँखें हमेशा सलामत होती हैं। उनकी याददाश्त कभी फिना नहीं होती। वो सिर्फ़ गैब

से आनेवाली किसी मोतबर आवाज़ की मुन्तजिर होती हैं।’

अपनी पिछली तमाम तहरीरों से बिलकुल अलग, इस किताब में, जाबिर हुसेन ने अपने पात्रों के नाम नहीं लिए। उस बस्ती का नाम लेने से भी परहेज़ किया, जिसकी बे-चिराग़ गलियों में इस लम्बी कथा-डायरी की बुनियाद पड़ी।

एक बिलकुल नए फ्रेम में लिखी गई यह कथा-डायरी कुछ लोगों को ज़िन्दा रूहों की दास्ताँ की तरह लगेगी। लेकिन इस दास्ताँ की जड़ें किसी पथरीली ज़मीं की गहराइयों में छिपी हैं।

जाबिर हुसेन ने इस पथरीली ज़मीन की गहराइयों में उतरने का ख़तरा मोल लिया है। जिन ज़िन्दा रूहों को उन्होंने इस तहरीर में अपना हमसफ़र बनाया है, वो अगर उनसे खूं-बहा तलब करें, तो उनके पास टूटे ख़्वाबों के सिवा देने को क्या है! जाबिर हुसेन जानते हैं, ये टूटे ख़्वाब उनके लिए चाहे जितने क़ीमती हों, बस्ती की ज़िन्दा रूहों के सामने उनकी कोई वक्अत नहीं।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2014
Edition Year 2014, Ed. 1st
Pages 160p
Price ₹300.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22.5 X 14.5 X 1.5
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Zabir Hussain

Author: Zabir Hussain

जाबिर हुसेन

अंग्रेज़ी भाषा एवं साहित्य के प्राध्यापक रहे। जेपी तहरीक में बेहद सक्रिय भूमिका निभाई। 1977 में मुंगेर से बिहार विधान सभा के लिए चुने गए। काबीना मंत्री बने। बिहार अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष रहे।
बिहार विधान परिषद् के सभापति रहे। राज्य सभा के सदस्य रहे।
हिन्दी-उर्दू में दो दर्जन से ज़्यादा किताबें प्रकाशित। उर्दू-फ़ारसी की लगभग 50 पांडुलिपियों का सम्पादन। उर्दू-हिन्दी की कई पत्रिकाओं का सम्पादन।

प्रमुख कृतियाँ : ‘रेत से आगे’, ‘चाक पर रेत’, ‘ये शहर लगै मोहे बन’ (हिन्दी-उर्दू), ‘डोला बीबी का मज़ार’, ‘रेत पर खेमा’, ‘ज़िन्दा होने का सबूत’, ‘लोगाँ, जो आगे हैं’, ‘अतीत का चेहरा’, ‘आलोम लाजावा’, ‘ध्वनिमत काफी नहीं’, ‘दो चेहरों वाली एक नदी’ (गद्य); कविता—‘कातर आँखों ने देखा’, ‘रेत-रेत लहू’, ‘एक नदी रेत भरी’, ‘उर्दू—अंगारे और हथेलियाँ’, ‘सुन ऐ कातिब’, ‘बे-अमां’, ‘बिहार की पसमांदा मुस्लिम आबादियाँ’।

सम्पादन : छह जिल्दों में बहार हुसेनाबादी का सम्पूर्ण साहित्य, ‘मेरा सफ़र तवील है’ : अखतर पयामी, ‘दीवारे शब’, ‘दयारे शब’, ‘हिसारे शब’, ‘निगारे शब’ (उर्दूनामा के अंक)।

सम्मान : 2005 में उर्दू कथा-डायरी ‘रेत पर खेमा’ के लिए ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’। 2012 में नवें विश्व हिन्दी सम्मेलन (जोहान्सबर्ग, दक्षिण अफ़्रीका) में ‘विश्व हिन्दी सम्मान’।

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