Dola Bibi Ka Mazaar

Author: Jabir Husain
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Dola Bibi Ka Mazaar

मैंने कब कहा कि मैं कहानियाँ लिखता हूँ। मैं तो बस अपने आसपास जो कुछ देखता हूँ, महसूस करता हूँ, वही लिखता हूँ। मेरे किरदार मेरी उन अनगिनत लड़ाइयों की खोज और उपज हैं, जो दशकों बिहार के गाँवों में लड़ी गई हैं, बल्कि आज भी लड़ी जा रही हैं। मैंने ये भी कब कहा कि मेरे पास गाँवों के दु:खों का इलाज हैं। मैं तो बस अपने किरदारों के यातनापूर्ण सफ़रनामे का

एक अदना साक्ष्य हूँ। एक साक्ष्य, जो कभी अपने किरदारों की रूह में उतर जाता है, और कभी किरदार ही जिसके वजूद का हिस्सा बन जाते हैं। मैं तटस्थ नहीं हूँ। मैं तटस्थ कभी नहीं रहा। आगे भी मेरे तटस्थ होने की कोई गुंजाइश नहीं है। मैं ख़ुद अपनी लड़ाइयों का एक अहम हिस्सा रहा हूँ, आज भी हूँ। मेरी नज़र में, तटस्थता किसी भी संवेदनशील आदमी या समाज के लिए आत्मघाती होती है। मैंने झंडे उठाए हैं, परचम लहराए हैं, नारे बुलन्द किए हैं। जो ताक़तें सदियों राज और समाज को अपनी मर्ज़ी से चलाती रही हैं, उनकी बख़्शी हुई यातनाएँ झेली हैं। लेकिन अपनी डायरी के पन्ने स्याह

करते वक़्त मैंने, कभी भी, इन यातनाओं को बैसाखी की तरह इस्तेमाल नहीं किया है। न ही मैंने इन्हें

अपने डायरी-शिल्प का माध्यम ही बनने दिया है। अतः मैं आप से कैसे कहूँ कि इस पुस्तक में शामिल तहरीरों को आप कहानी के रूप में स्वीकारें।

More Information
Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 2003
Edition Year 2003, Ed. 1st
Pages 210p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22.5 X 14 X 2
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Author: Jabir Husain

जाबिर हुसेन

अंग्रेज़ी भाषा एवं साहित्य के प्राध्यापक रहे। जेपी तहरीक में बेहद सक्रिय भूमिका निभाई। 1977 में मुंगेर से बिहार विधान सभा के लिए चुने गए। काबीना मंत्री बने। बिहार अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष रहे।

बिहार विधान परिषद् के सभापति रहे। राज्य सभा के सदस्य रहे।

हिन्दी-उर्दू में दो दर्जन से ज़्यादा किताबें प्रकाशित। उर्दू-फ़ारसी की लगभग 50 पांडुलिपियों का सम्पादन। उर्दू-हिन्दी की कई पत्रिकाओं का सम्पादन।

प्रमुख कृतियाँ : ‘रेत से आगे’, ‘चाक पर रेत’, ‘ये शहर लगै मोहे बन’ (हिन्दी-उर्दू), ‘डोला बीबी का मज़ार’, ‘रेत पर खेमा’, ‘ज़िन्दा होने का सबूत’, ‘लोगाँ, जो आगे हैं’, ‘अतीत का चेहरा’, ‘आलोम लाजावा’, ‘ध्वनिमत काफी नहीं’, ‘दो चेहरों वाली एक नदी’ (गद्य); कविता—‘कातर आँखों ने देखा’, ‘रेत-रेत लहू’, ‘एक नदी रेत भरी’, ‘उर्दू—अंगारे और हथेलियाँ’, ‘सुन ऐ कातिब’, ‘बे-अमां’, ‘बिहार की पसमांदा मुस्लिम आबादियाँ’।

सम्पादन : छह जिल्दों में बहार हुसेनाबादी का सम्पूर्ण साहित्य, ‘मेरा सफ़र तवील है’ : अखतर पयामी, ‘दीवारे शब’, ‘दयारे शब’, ‘हिसारे शब’, ‘निगारे शब’ (उर्दूनामा के अंक)।

सम्मान : 2005 में उर्दू कथा-डायरी ‘रेत पर खेमा’ के लिए ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’। 2012 में नवें विश्व हिन्दी सम्मेलन (जोहान्सबर्ग, दक्षिण अफ़्रीका) में ‘विश्व हिन्दी सम्मान’।

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