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Yakshini-Paper Back

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ऐसा कहते हैं हठयोगी और युंग भी कि आदमी का वजूद, उसकी स्मृतियाँ, खासकर जातीय स्मृतियाँ, एक परतदार शिला की तरह उसके अवचेतन के मुँह पर सदियों पड़ी रहती हैं। फिर अचानक कोई ऐसा क्षण आता है कि शिला दरकती है, हहाता हुआ कुछ उमड़ आता है बाहर और कूल-कछार तोड़ता हुआ सारा आगत-विगत बहा ले जाता है। शेष रहता है एक संदीप्त वर्तमान और उस पर पाँव और चित्त टिकाकर कोई खड़ा रह गया तो उसकी बूँद समुद्र हो जाती है यानी अगाध हो जाती है उसकी चेतना ।

ऐसा लगता है कि अपने डॉ. विनय सचमुच ही प्रत्यभिज्ञा के किसी विराट एहसास से गुजरे हैं। जिन बारह आर्किटाइपों की बात युग कहते हैं-योद्धा, प्रेमी, संन्यासी, सेवा-निपुण, अभियानी, जादूगर, विदूषक, नियोजक, द्रष्टा, भोला-भंडारी, विद्रोही वगैरह, उनमें इनका वाला आर्किटाइप प्रेमी-संन्यासी विद्रोही तीनों की मिट्टी मिलाकर बना होगा जैसा कि सर्जकों का अक्सर होता है।

एक क्षीण कथा-वृत्त के सहारे तीन मुख्य किरदार कौंधते हैं-रानी, उसकी अनुचरी यक्षी और वह शिल्पी जो आया तो था रानी का उद्यान तरह-तरह की मूर्तियों से सजाने पर यक्षी की छवि उसके भीतर के पानियों में उसके जाने-अनजाने, चाहे अनचाहे ऐसी उतरी कि सबसे बड़ी शिला पर उसी की मूर्ति उत्कीर्ण हो गई। ईर्ष्या-दग्ध रानी की तलवार उसका एक हाथ काट तो गई पर फिर सदियों बाद जब भग्न मूर्ति के आश्रय उसकी स्मृतियाँ जगीं तो उमड़ पड़ा पचासी बन्दों का सजग आत्म-निवेदन इसकी सान्द्रता, त्वरा और चित्रात्मकता डी.एच. लॉरेन्स के मैन-वुमन-कॉस्मॉस वाले उस अभंग गुरुत्वाकर्षण की याद दिला देती है जिसका आवेग हिन्दी की कुछ और लम्बी कविताओं में कल-कल छल-छल करके बहता दिखाई देता है (जैसे कि उर्वशी, कनुप्रिया, मगध, बाघ आदि में)।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back, Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2019
Edition Year 2023, Ed. 2nd
Pages 152P
Price ₹250.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 19.5 X 13 X 1
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Vinay Kumar

Author: Vinay Kumar

विनय कुमार

विनय कुमार का जन्म 9 जून, 1961 को बिहार के जहानाबाद ज़िले के कन्दौल गाँव में हुआ। उन्होंने पटना मेडिकल कॉलेज, पटना से एम.डी. (मनोचिकित्सा) किया।

उनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं—‘क़र्ज़े-तहजीब एक दुनिया है’ (ग़ज़ल-संग्रह); ‘आम्रपाली और अन्य कविताएँ’, ‘मॉल में कबूतर’, ‘यक्षिणी’ तथा ‘पानी जैसा देस’ (कविता-संग्रह); ‘आत्मज’ (काव्य-नाटक); ‘एक मनोचिकित्सक के नोट्स’ और ‘मनोचिकित्सा संवाद’ (मनोसामाजिक विमर्श)। उन्होंने इंडियन साइकायट्रिक सोसाइटी के लिए मनोचिकित्सा-शिक्षा विषयक सात किताबों का सम्पादन/सह-सम्पादन और मानसिक स्वास्थ्य की हिन्दी पत्रिका ‘मनोवेद डाइजेस्ट’ का सम्पादन किया है। मनोरोग से सम्बन्धित विषयों पर अख़बारों तथा पत्रिकाओं में उनका विपुल लेखन है।

वे इंडियन साइकाएट्रिक सोसाइटी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष (2023-24), वर्ल्ड साइकाएट्रिक एसोसिएशन में दक्षिण एशिया की ओर से बोर्ड मेम्बर तथा वर्ल्ड एसोसिएशन फॉर सोशल साइकाएट्री के सुइसाइडॉलजी सेक्शन के सेक्रेटरी हैं।

उन्हें मनोचिकित्सा सेवा के लिए इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के ‘डॉ. रामचन्द्र एन. मूर्ति सम्मान–2007’, अन्तरराष्ट्रीय योगदान के लिए अमेरिकन साइकाएट्रिक एसोसिएशन के ‘डिस्टिंग्विश्ड फेलो सम्मान’, ‘एक मनोचिकित्सक के नोट्स’ के लिए ‘अयोध्या प्रसाद खत्री स्मृति सम्मान–2015’ तथा कविता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए ‘बनारसी दास भोजपुरी सम्मान–2019’ से सम्मानित किया जा चुका है।

सम्प्रति : मनोवेद माइंड हॉस्पिटल, पटना में मनोचिकित्सक।

ई-मेल : [email protected]

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