कवि केशव चन्द्र की जितनी रुचि कविता में है, उतनी ही चित्रकला, फ़ोटोग्राफ़ी और इतिहास में भी है। यही कारण है कि उनकी कविताएँ देखे-जाने गए यथार्थ को कई आयामों से देखती हैं।
इस संकलन में प्रकाशित कविताएँ उनके जीवन-अनुभव, चिन्तन, दर्शन और विचारों की अभिव्यक्ति हैं। कविता को वे आत्मा के विराट के साथ संलयन की साधना मानते हैं। यह एक आन्तरकि परधिटना है, जिसकी परणति बड़े सामाजिक सन्दर्भों में होती है।
ये कविताएँ यदि एक तरफ़ एक क्षण के उस सूक्ष्मांश को भी पकड़ लेती हैं जो पानी में डूबते हुए आदमी को पानी की ताज़गी से मिलने वाली राहत का साक्षी होता है, तो दूसरी तरफ़ सत्ता तथा शक्ति की स्थूल संरचनाओं को भी जो व्यक्ति को एक यंत्र मात्र बनाने को तत्पर रहती हैं।
इन कविताओं की परिधि में वे प्रश्न भी आते हैं जो मनुष्य के अस्तित्व के साथ अनादि से जुड़े हैं, और वे भी जिनका ताल्लुक़ हमारे आज और अभी से है—
हरेक आदमी एक नए युद्ध के साथ खड़ा है/और धूप में टँगा समाज अब सो रहा है।
कवि के अपने शब्दों में ‘कला का उद्देश्य सौन्दर्य की उपासना नहीं, सत्य का अनुसन्धान है। वह वर्चस्व की भाषा को अभिव्यंजित नहीं करती, बल्कि उन अनुपस्थितियों को उद्घाटित करती है, जिन्हें इतिहास या वर्तमान ने विस्मृति के गर्त में डाल दिया है।’
ये कविताएँ शब्दशः यही करती हैं।
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Paper Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 2025 |
| Edition Year | 2025, Ed. 1st |
| Pages | 144p |
| Publisher | Rajkamal Prakashan |
| Dimensions | 22 X 14.5 X 1.5 |