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Stree : Adhikar Aur Kanoon-Paper Back

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‘स्त्री : अधिकार और क़ानून’ तसलीमा नसरीन के आलेखों और टिप्पणियों का संकलन है। उनकी बहस मानवीय स्वतंत्रता के पक्षधर ऐसे तर्कों के आधार पर होती है, जिन्हें खुली सोच वाला कोई भी न्यायप्रिय व्यक्ति स्वीकार करेगा। लेकिन धार्मिक, पारम्परिक और शक्तिकामी दुराग्रहों में उलझे लोगों को वे स्वीकार्य नहीं लगते। उनके कहने का ढंग और उनकी भाषा भी कई लोगों को आपत्तिजनक लगती है।

इस संकलन के आलेखों में तसलीमा नसरीन ने तीन तलाक, घरेलू हिंसा, विवाह, समलैंगिकता, बांग्लादेश में हिन्दू ​स्त्रियों की स्थिति, बहुविवाह, महिला दिवस, स्त्री-देह, परिवार और अन्य कई विषयों पर विचार किया है—कहीं संस्मरणात्मक पृष्ठभूमि में और कहीं घटनाओं के बहाने से।

उनका कहना है कि अत्याचार के शिकार मनुष्यों में स्त्रियाँ ही एकमात्र ऐसा समूह हैं, जो अत्यन्त घनिष्ठ रूप में अपने अत्याचारियों के साथ वास करता है। पश्चिम की स्त्रियों ने अपने लिए एक घर का इन्तज़ाम कर लिया है, तो समाज उन्हें अब कोई डर नहीं दिखाता, लेकिन भारतवर्ष की स्त्रियों को समाज लाल सुर्ख़ आँखों से ऐसे घूर रहा है कि वे डर के मारे दुबकी हुई हैं।

समलैंगिकता के विषय में उनका कहना है कि जो लोग इस समुदाय की सामाजिक स्वीकृति का समर्थन नहीं करते, उनके अधिकारों के पक्ष में खड़े नहीं होते, उन्हें मानवाधिकारों का पक्षधर भी नहीं कहा जा सकता, और न ही प्रगतिशील। वे ज़ोर देकर कहती हैं कि समकामी या समलैंगिक होना सिर्फ़ यौन-सम्बन्धों का मसला नहीं है, यह प्रेम का सम्बन्ध है।

स्त्रियों से जुड़े कई अन्य सामाजिक और क़ानूनी पहलुओं पर उन्होंने ‌इसी तरह दो टूक विचार किया है।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back, Paper Back
Translator Uttpal Banerjee
Editor Not Selected
Publication Year 2024
Edition Year 2024, Ed. 1st
Pages 264p
Price ₹350.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 20 X 14 X 2
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Taslima Nasrin

Author: Taslima Nasrin

तसलीमा नसरीन         

जन्म : 25 अगस्त, 1962; बांग्लादेश के मैमनसिंह शहर में।

शिक्षा : विज्ञान की छात्रा। मैमनसिंह मेडिकल कॉलेज से एम.बी.बी.एस.।

लेखन की शुरुआत कविता से मात्र 13 वर्ष की आयु में। प्रथमत: और मूलत: कवयित्री तसलीमा ने स्तम्भकार के तौर पर भी महत्त्वपूर्ण वैचारिक लेखन के ज़रिए पाठकों को गहराई से उद्वेलित किया और अपनी कथा-कृतियों, विशेषकर ‘लज्जा’ उपन्यास के साथ आत्मालोचन की मज़बूत चुनौती के रूप में उपस्थित हुईं। अभिव्यक्ति की स्वाधीनता के लिए न सिर्फ़ ढाका मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के चिकित्सक पद से त्यागपत्र दिया बल्कि ‘देशनिकाला’ के कठिन मार्ग का भी वरण किया। 1994 से उनका बांग्ला देश में और 2007 से पश्चिम बंगाल में प्रवेश निषिद्ध है।

कृतियाँ : ‘शिकड़े बिपुल खुधा’, ‘निर्बासितो बाहिरे ओन्तरे’, ‘अतले अन्तरीण’, ‘बालिकार गोल्लाछूट’, ‘बेहुला एका भासिए छिलो भेला’, ‘आय कष्ट झेंपे-जीबन देबो मेपे’, ‘निर्बासित नारीर कोबिता और जल पद्य’ (कविता)। ‘लज्जा’, ‘फेरा’ व ‘चार कन्या’ (उपन्यास); ‘निर्वासित कलाम’, ‘नष्ट मेयेर नष्ट गद्य’ (स्तम्भ लेख व टिप्पणियाँ); ‘आमार मेये बेला’ (जीवनी) आदि।

'लज्जा’ समेत आपकी कई रचनाओं का दुनिया की तीस भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।

सम्मान : दो बार भारत का प्रतिष्ठित 'आनन्द पुरस्कार’ (1991 व 2000 में), स्वीडिश पेन क्लब का ‘कुर्त तुखोलस्की पुरस्कार’ (1994), फ़्रांस का ‘एडिट द नानत पुरस्कार’ (1994); फ़्रांस सरकार का ‘मानवाधिकार पुरस्कार’, ‘शाखारोव पुरस्कार’, गोधेमबर्ग विश्वविद्यालय का ‘मनिसमियेन पुरस्कार’ (1995) और इंटरनेशनल ह्यूमनिस्ट एंड एथिकल यूनियन का 'ह्यूमनिस्ट पुरस्कार’ (1996)। बेल्जियम के गेंट विश्वविद्यालय ने 1995 में ‘डॉक्टरेट’ की उपाधि से सम्मानित किया। सहिष्णुता एवं अहिंसा के प्रसार के लिए 2005 में यूनेस्को से ‘मदनजीत सिंह पुरस्कार’; इनके अलावा भी विश्व के कई देशों द्वारा सम्मानित। हॉर्वर्ड एवं न्यूयॉर्क विश्वविद्यालयों से शोध-वृत्ति। 2009 में अमेरिका की वुडरो विल्सन फ़ेलो रही।

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