Facebook Pixel

Smriti Aur Dansh : Vibhajan, Nirantarata Aur Teesri Pirhi

Author: Balwant Kaur
Edition: 2025, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
As low as ₹299.25 Regular Price ₹399.00
25% Off
In stock
SKU
Smriti Aur Dansh : Vibhajan, Nirantarata Aur Teesri Pirhi

- +
Share:
Codicon

जैसे-जैसे मैं जीवन में आगे बढ़ती गई, मैंने कट्टरपन्थियों के पागलपन का विरोध करने की हमेशा कोशिश की, चाहे वे किसी भी समुदाय के हों।...मुझे पता था कि मेरे बचपन के सपनों का भारत बिखर गया था। शायद बलवन्त का भारत भी बिखर गया इसीलिए मैं और वह इस असामान्य प्रस्तावना के ज़रिये एक सह-अनुभूति रखते हैं, जिसे मैं पेश कर रही हूँ क्योंकि जब मैं इस अशान्त राष्ट्र के इतिहास को याद करती हूँ तो मेरा मन इसी तरह भटकता है।

—उमा चक्रवर्ती इतिहासकार

क्या बलवन्त कौर की यह कृति आत्मकथा, साहित्य-अध्ययन, इतिहास और समाजशास्त्र के बीच आवाजाही करती है? नहीं; यह इन सबको एक साथ लाकर बल्कि मिलाकर अन्दरूनी सरहदों से मुक्त एक अवकाश बनाती है जिसमें आप किसी अनुशासन के प्रति आत्मसजग हुए बगैर घूम-फिर सकते हैं। आपको पता नहीं चलता कि कब व्यक्तिगत संस्मरण सुनते-सुनते साहित्यिक कृतियों के साथ आपका संवाद शुरू हो गया और कब इतिहासकारों तथा समाजशास्त्रियों के हवाले से आप हिंसा, पहचान, अन्यीकरण, विभाजन-विस्थापन के सवालों से दो-चार होने लगे। विभाजन और उसकी निरन्तरता पर यह निस्सन्देह एक अनोखी किताब है।

—संजीव कुमार आलोचक 

More Information
Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2025
Edition Year 2025, Ed. 1st
Pages 232p
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 21.5 X 14 X 1.5
Write Your Own Review
You're reviewing:Smriti Aur Dansh : Vibhajan, Nirantarata Aur Teesri Pirhi
Your Rating
Balwant Kaur

Author: Balwant Kaur

बलवन्त कौर

आलोचक, अनुवाद तथा सम्पादक बलवन्त कौर हिन्दी, अंग्रेजी के अतिरिक्त पंजाबी तथा उर्दू की भी जानकार हैं। लगभग तीस वर्षों से दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस में अध्यापन कर रही हैं। हिन्दी साहित्य की प्रसिद्ध पत्रिका ‘हंस’ के सम्पादन कार्य से भी अनेक वर्षों तक जुड़ी रहीं। आधुनिक कथा साहित्य, स्त्री अध्ययन, और विभाजन पर आधारित साहित्य इनके अध्ययन के मुख्य क्षेत्र रहे हैं।

इनके कई लेख और अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं। कई महत्वपूर्ण किताबों का सम्पादन भी किया है, जैसे—स्त्री आत्मकथांशों की पुस्तक ‘देहरि भई बिदेस’, राजेन्द्र यादव के सम्पादकीयों की किताबें ‘काश मैं राष्ट्र द्रोही होता’ तथा ‘वे हमें बदल रहे हैं’, 1931 में ज्योति प्रसाद मिश्र ‘निर्मल’ द्वारा सम्पादित ‘स्त्री कवि कौमुदी’ जैसी दुर्लभ पुस्तक की पुनर्प्रस्तुति , 2009 में ‘हंस’ के विशेषांक ‘स्त्री-विमर्श : अगला दौर’ के अलावा ‘राजेन्द्र यादव रचनावली’ के 15 खंडों का सम्पादन तथा ‘किसान आन्दोलन : लहर भी , संघर्ष भी और जश्न भी’।

ई-मेल : [email protected]

Read More
Books by this Author
New Releases
Back to Top