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Shunya Tatha Any Rachanayen-Hard Cover

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9788171785551
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कुछ कहानियाँ, कुछ यात्रा-संस्मरण और अमरीका से श्रोताओं के नाम लिखे गए चौदह पत्रों का यह संग्रह कथाकार उषा प्रियम्वदा के उस प्रवासी मन के भीतर झाँकने का मौक़ा देता है जो लम्बे विदेश-प्रवास के बावजूद आज भी भारतीय है।

चिर-परिचित संवेदनशील शैली में लिखी इन मार्मिक कहानियों के भीतर से झाँकती मानसिकता आज भी अपनी देसी पहचान नहीं खो पाई है। चारों तरफ़ फैला जीवन अपने समूचे आकर्षण-विकर्षण के बावजूद है तो विदेशी ही। देसी और विदेशी के बीच लगातार होता संवाद उषा की इन रचनाओं का प्रमुख आकर्षण है। सुदूर अमरीका के विस्कांसिन शहर में बैठी यह भारतीय कथाकार चाहे कहानियों के ताने-बाने बुने, चाहे अपने समूचे व्यक्तित्व को साथ लिए-दिए यूरोप-भ्रमण करे या फिर उस विराट परदेस अमरीका की अपनी पहचान को पत्रों के माध्यम से उजागर करे, पाठक भूल ही नहीं सकता कि इनके पीछे से झाँकता एक मन है जो ठेठ भारतीय है।

“प्रवासी के लिए घर लौटना एक मधुर और कचोट-भरा अवसर होता है। पर साथ ही कहीं छुपा यह बोध भी रहता है कि हम पूरी तरह घर नहीं लौट पाएँगे। हमारा एक अंश, हमारी भावनाओं और अनुभवों का एक भाग जैसे पीछे रह जाता है।”

प्रवासी मन के इन्हीं मधुर-तिक्त अनुभवों की दास्तान हैं ये रचनाएँ जो पाठक को बहुत गहराई तक उद्वेलित करती हैं।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 1996
Edition Year 2025, Ed. 3rd
Pages 163p
Price ₹595.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14 X 1.5
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Usha Priyamvada

Author: Usha Priyamvada

उषा प्रियम्वदा

शिक्षा : इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में पीएच.डी., इंडियाना यूनिवर्सिटी, ब्लूमिंगटन, अमेरिका में तुलनात्मक साहित्य में दो वर्ष पोस्ट-डॉक्टरल शोध। अध्यापन के प्रथम तीन वर्ष दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज में, तदुपरान्त इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दो वर्ष में सम्पन्न करके, विस्कांसिन विश्वविद्यालय मेडिसन के दक्षिण एशियाई विभाग में प्रोफ़ेसर रहीं। हिन्दी और अंग्रेज़ी, दोनों ही भाषाओं में समान रूप से दक्ष उषा प्रियम्वदा ने साहित्य सृजन के लिए हिन्दी और समीक्षा, अनुवाद और अन्य बौद्धिक क्षेत्रों के लिए अंग्रेज़ी का चयन किया।

प्रकाशित पुस्तकें : उपन्यास : ‘पचपन खम्भे लाल दीवारें’ (1961), ‘रुकोगी नहीं राधिका’ (1966), ‘शेष यात्रा’ (1984), ‘अन्तर-वंशी’ (2000), ‘भया कबीर उदास’ (2007); कहानी-संग्रह : ‘फिर बसंत आया’ (1961), ‘ज़‍िन्दगी और गुलाब के फूल’ (1961), ‘एक कोई दूसरा’ (1966), ‘कितना बड़ा झूठ’, ‘मेरी प्रिय कहानियाँ’, ‘शून्य एवं अन्य रचनाएँ’, ‘सम्पूर्ण कहानियाँ’, ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’ (1997)।

इसके अतिरिक्त भारतीय साहित्य, लोककथा एवं मध्यकालीन भक्ति काव्य पर अनेक लेख जो अंग्रेज़ी में समय-समय पर प्रकाशित हुए। मीराबाई और सूरदास के अंग्रेज़ी अनुवाद ‘साहित्य अकादेमी’, नई दिल्ली ने पुस्तक रूप में प्रकाशित किए। उन्होंने आधुनिक हिन्दी कहानियों के भी अनुवाद किए।

इंडियन स्टडीज विभाग से संलग्न रहते हुए 1977 में उन्हें 'फुल प्रोफ़ेसर ऑफ़ इंडियन लिट्रेचर’ का पद मिला। 2002 में अवकाश लेकर अब पूरा समय लेखन, अध्ययन और बाग़वानी में बिता रही हैं।

 

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