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Sheron Se Meri Mulakatein-Paper Back

Special Price ₹54.00 Regular Price ₹60.00
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9788171196975
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“अचानक जंगल में सन्नाटा गहरा गया। उस गहरे सन्नाटे को चीरती हाथियों के चिंघाड़ने की आवाज़ें, तभी एक अजीब–सी आवाज़ हाथियों की ओर से आई। मैं समझ गया कि यह वही आवाज़ है जो हाथी अपनी सूँड़ ज़मीन पर पटककर निकालते हैं लेकिन सिर्फ़ शेर के आसपास होने पर–––और फिर सारा जंगल शेर की दहाड़ से काँप उठा।’’ शेर से नज़दीकी का हैरतअंगेज़ रोमांच और एक शिकारी होने का एहसास आपके ज़ेहन को गुदगुदाए बिना नहीं रहेगा। हास्य और व्यंग्य से सँवारे ये लेखक के नितान्त अपने अनुभव हैं।

शेरजंग की इस किताब में एक शिकारी का रोमांच भी है और शेरों के प्रति बाल सहज जिज्ञासा के जवाब भी। शुरू करते ही एक रोचकता पाठक को जकड़ते हुए, एक ऐसी दुनिया में ले जाती है जहाँ शेर ही नहीं जंगल के सारे जानवरों का एहसास होता है। जिसमें शामिल हैं—उनकी आदतें, व्यवहार और उनका जीवन–चक्र।

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Language Hindi
Binding Hard Back, Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Isbn 10 8171196977
Publication Year 2002
Edition Year 2021, Ed. 2nd
Pages 176p
Price ₹60.00
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 1.5
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Author: Sherjung

शेरजंग

जन्म : 27 नवम्बर, 1904।

शिक्षा : अधिकतर स्वशिक्षण। अंग्रेज़ी, हिन्दी, उर्दू, फ़ारसी, बांग्ला और जर्मन भाषाओं के ज्ञाता।

जीवन की मुख्य घटनाएँ : आरम्भ से बहिर्मुखी और घुमक्कड़ प्रवृत्ति के धनी शेरजंग एक ज़मींदार परिवार में पैदा होने के बावजूद युवावस्था में ही ज़मींदारी के ख़िलाफ़ हो गए थे। किशोरावस्था से ही वे स्वतंत्रता-आन्दोलन में शरीक हो गए जिसके परिणामस्वरूप अंग्रेज़ी सरकार ने उन्हें फाँसी की सज़ा सुनाई जो बाद में चलकर आजीवन कारावास में बदल गई। मई, 1938 में रिहाई और उसी वर्ष शादी। 1940 में पुनः गिरफ़्तार। 1944 में रिहाई और देश को स्वतंत्रता मिलने तक दिल्ली की सिविल लाइंस में नज़रबन्द।

स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद 1947-48 में शरणार्थी शिविरों का आयोजन। कश्मीर मिलीशिया का संगठन किया और कर्नल की मानद उपाधि से सम्मानित हुए। बंगाल में दंगों के दौरान साम्प्रदायिक सौहार्द के लिए कार्य किया। गोवा मुक्ति आन्दोलन में संलग्न रहे।

प्रमुख कृतियाँ : ‘लोरजा’ (कविता-संग्रह); ‘लाइफ़ एंड टीचिंग ऑफ़ कार्ल मार्क्स’, ‘हिस्ट्री ऑफ़ कम्युनिस्ट रशिया’, ‘ट्रिस्ट विथ टाइगर’, ‘रैंबलिंग इन टाइगरलैंड’, ‘गनलोर’, ‘प्रिज़न डेज़’ और उर्दू में एक उपन्यास। ग़ालिब और हाफ़िज़ की ग़ज़लों के हिन्दी रूपान्तरण, ‘दस स्पेक जरथुष्ट्र’। हिन्दी में : ‘कारावास के दिन’।

निधन : 15 दिसम्बर, 1996।

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