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Gandhi Ka Saintalis

Author: Pushya Mitra
Edition: 2026, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
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Gandhi Ka Saintalis

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 ‘गांधी का सैंतालीस’ यानी आज़ादी के साल में गांधी की कथा। वैसे तो यह कहानी गांधी के जीवन के आख़िरी साल की है, जो अक्टूबर, 1946 में उनकी नोआखाली यात्रा से शुरू होती है और वहाँ से बिहार, दिल्ली, कलकत्ता और फिर दिल्ली आकर जनवरी, 1948 में उनकी शहादत के साथ ख़त्म होती है। मगर यह उनके आख़िरी साल का रोज़नामचा नहीं है, यह उनकी आख़िरी लड़ाई की कहानी है।

डायरेक्ट एक्शन के बाद भारत में साम्प्रदायिक दंगे शुरू हुए, जो बँटवारे के फ़ैसले पर मुहर लगने के बाद और बढ़ गए। इन दंगों ने लाखों की जान ली और करोड़ों को विस्थापित होने के लिए मजबूर कर दिया। उस समय एक गांधी ही थे, जो नफ़रत की इस आग को बुझाने में लगे थे। उन्हें बस एक ही चिन्ता थी कि इस देश की आत्मा कैसे बचे; वह देश जो पिछले तीस साल से अहिंसक तरीक़े से आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था, आज़ादी के ठीक पहले हिंसा से भर उठा था। लोग अपने पड़ोसियों के ख़ून के प्यासे हो गए थे।

इस लड़ाई में 77 साल के गांधी ने अपना सब कुछ झोंक दिया—नंगे पाँव यात्रा करते, पीड़ितों के ज़ख़्मों पर मरहम लगाते, उनके हृदय में साहस भरते और दंगाइयों को सच्चे हृदय से पश्चात्ताप करने के लिए प्रेरित करते हुए। उन्होंने संवाद, साहस और प्रेम के औज़ारों से यह लड़ाई लड़ी और अपने आख़िरी हथियार शहादत के ज़रिये इस महान लक्ष्य को हासिल किया।

यह भी कहना ज़रूरी है कि यह कहानी गांधी के जीवन के इस सर्वश्रेष्ठ दौर की गौरवगाथा भर नहीं है। कोशिश की गई है कि यह कहानी हमारे सामने एक बोधपाठ की तरह खुले ताकि हम देख सकें कि क्या गांधी की इस आख़िरी लड़ाई के तौर-तरीक़ों में कुछ ऐसा भी है जिसे हम आज के भारत में प्रयोग कर सकें! 

More Information
Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2026
Edition Year 2026, Ed. 1st
Pages 320p
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 21.5 X 14 X 2
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Pushya Mitra

Author: Pushya Mitra

पुष्यमित्र

पुष्यमित्र घुमन्तू पत्रकार और लेखक हैं। उनका जन्म मुंगेर में हुआ। वैसे पैतृक गाँव बिहार के पूर्णिया जिले का धमदाहा गाँव है। उन्होंने पहले नवोदय विद्यालय और फिर भोपाल के पत्रकारिता विश्वविद्यालय में पढ़ाई की। उनकी पत्रकारिता-यात्रा भोपाल, दिल्ली, हैदराबाद, चंडीगढ़ जैसे शहरों से होती हुई बिहार-झारखंड में जारी है। वे दैनिक अखबार ‘नवभारत’, ‘अमर उजाला’, ‘हिन्दुस्तान’, ‘प्रभात खबर’ आदि से सम्बद्ध रहे। कुछ न्यूज़ पोर्टलों के लिए नियमित लेखन किया और अब ‘इंडिया टुडे’ हिन्दी के साथ जुड़े हैं। उनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं—‘रुकतापुर’, ‘जब नील का दाग़ मिटा : चम्पारण-1917’, ‘कोसी के वटवृक्ष’, ‘सुन्नैर नैका’, ‘फणीश्वरनाथ रेणु : एक अप्रतिम कथाकार, एक जन्मजात विद्रोही’। ‘रेडियो कोसी’ पहला उपन्यास है।

सम्पर्क : [email protected]

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