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Gagan Ghata Ghahrani

Author: Manmohan Pathak
Edition: 2026, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Radhakrishna Prakashan
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Gagan Ghata Ghahrani

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गगन घटा घहरानी उपन्यास की पृष्ठभूमि में झारखंड है—पलामू और उसके आसपास के क्षेत्र; और पात्र हैं आदिवासी-सदान, महाजन और जमींदार।

महाजनी सामन्ती तंत्र में आम आदिवासी जन का जीवन अबाध शोषण और उत्पीड़न से आक्रान्त है। बेगार, पिटाई और बेदखली से लेकर बलात्कार तक, हर तरह का अत्याचार उनके दैनन्दिन जीवन का हिस्सा हैं। जमींदार किसी पर ज्यादा ही नाराज हो जाए तो उसे अपने पालतू चीते का भोजन भी बना देता है। और सरकार के हाकिम-हुक्काम भी किसके साथ खड़े होते हैं यह भी सबको पता है।

यही परिस्थितियाँ आखिरकार आदिवासियों को जमींदार की गढ़ी पर चढ़ाई करने के लिए विवश करती हैं। इस उपन्यास में जो वर्णित है वह किसी मध्ययुग की नहीं बल्कि हमारे ही समय की कहानी है। कोई पाँच दशक पहले उभरे उस आन्दोलन का जीवन्त औपन्यासिक चित्र, जिसे झारखंड के एक स्वतंत्र राज्य के रूप में गठन के आन्दोलनों की शृंखला से अलग कर नहीं देखा जा सकता।

आज भी आदिवासी जनजीवन नई चुनौतियों से रू-ब-रू है। उनकी अस्मिता और अधिकारों पर नये-नये खतरे मँडरा रहे हैं। ऐसे में यह उपन्यास एक अनिवार्य पाठ है जिसमें आदिवासियों की उस संघर्ष-परम्परा का अंकन है जिसे उन्होंने इतिहास के अपने लम्बे अनुभव से हासिल किया है, और जिसकी बदौलत वे शोषकों को पीछे धकेलते आए हैं। 

More Information
Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2026
Edition Year 2026, Ed. 1st
Pages 336p
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 21.5 X 14 X 2
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Manmohan Pathak

Author: Manmohan Pathak

मनमोहन पाठक

मनमोहन पाठक का जन्म 1 अक्टूबर, 1947 को झरी गाँव, पलामू (बिहार) में हुआ जो अब झारखंड में पड़ता है। उन्होंने राँची विश्वविद्यालय, राँची से एम.ए. (स्वर्ण पदक के साथ) किया। अपने पेशेवर जीवन में उन्होंने कोल इंडिया लिमिटेड के विभिन्न पदों पर कार्य किया और वहीं से सेवानिवृत्त हुए।

उनका साहित्यिक लेखन 1970 के दशक में कविता लिखने से आरम्भ हुआ। लेखन के साथ-साथ उन्होंने ‘सम्भावना’, ‘पुटुस’ और झारखंड की सांस्कृतिक पत्रिका ‘शालपत्र’ का सम्पादन भी किया। उनकी कविताएँ और कहानियाँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। ‘गगन घटा घहरानी’ उनका एकमात्र प्रकाशित उपन्यास है। झारखंड के आदिवासियों का जीवन-संघर्ष उनकी रचनाओं के केन्द्र में रहा है।

उन्हें बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान (1992) से सम्मनित किया गया है। 

फ़िलहाल धनबाद में रहते हैं और लिखने-पढ़ने में व्यस्त हैं।     

ई-मेल : [email protected] 

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