प्रभात हिन्दी के विशिष्ट कवि हैं। लोक उनकी कविताओं में शब्दों से ज़्यादा साँस की तरह आता है, जिया हुआ, जीवन देता हुआ। उनका सम्बन्ध राजस्थान के माड़ अंचल से है जहाँ गीतों की एक लम्बी मौखिक परम्परा है—गीत जोड़ने यानी रचने की भी और सैकड़ों के समूह में उन्हें गाने की भी।
‘पेड़ पौनू सूँ हालै’ इसी परम्परा में लिखे गये उनके गीतों का संकलन है जिन्हें वे पिछले तीस साल से लिखते-सँजोते रहे हैं। गीतों का राग, धुन, विन्यास सब माड़ भाषा का है, हाँ रचना की प्रक्रिया में कुछ नई धुनें और नए विषय इनमें जरूर आ जुड़े हैं जिसका श्रेय कवि की रचनात्मकता और प्रगतिशील मूल्यबोध को जाता है। किताब में जितने गीत हैं उतने ही चित्र भी हैं जिन्हें महिलाएँ कच्चे घरों की दीवारों और आँगनों में बनाती हैं।
माड़ के लोक-मन और जीवन को उकेरते गीतों और कविताओं का संग्रह।
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Paper Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 2026 |
| Edition Year | 2026, Ed. 1st |
| Pages | 124p |
| Publisher | Rajkamal Prakashan |
| Dimensions | 22 X 16.5 X 1 |