Facebook Pixel

Parimal : Smritiyan Aur Dastavej

Edition: 2026, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Lokbharti Prakashan
As low as ₹449.10 Regular Price ₹499.00
10% Off
In stock
SKU
Parimal : Smritiyan Aur Dastavej

- +
Share:
Codicon

आज़ादी के बाद कला और संस्कृति के क्षेत्र में जो बदलाव हुए उनसे हिन्दी साहित्य में बड़े महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। इन परिवर्तनों के केन्द्र में पाँचवें और छठवें दशक ने काफी बदलाव दर्ज किये, जिनका मूल स्वरूप हिन्दी साहित्य-जगत की आपसी प्रतिस्पर्द्धा और अनर्गल प्रचार से धूमिल-सा हो गया।

इन मूलभूत बदलावों के केन्द्र में प्रायः इलाहाबाद की साहित्यिक संस्था ‘परिमल’ ने बहुतेरे मूल्यगत परिवर्तनों की शुरुआत की। यह काम किसी योजनाबद्ध तरीके से नहीं किया गया, बल्कि कुछ मनमौजी अलमस्त युवकों ने मिल-जुलकर एक साहित्यिक संस्था बनाई जिसका नाम ‘परिमल’ रखा। आज इतना वक़्त बीत जाने पर उस संस्था के कार्यों का जैसा महत्त्व ऐतिहासिक दृष्टि से बन गया है वह अपने आप में अचरज का विषय है। इसको लेकर बहुत-सी घटिया बातें ईर्ष्यालु लेखकों ने प्रचारित कीं। ऐसे में यह ज़रूरी हो गया कि ‘परिमल’ के एकाध लेखक जो बचे-खुचे रह गये हैं, वे भ्रमों का निराकरण करें और सही तथ्यों को सामने रखकर ‘परिमल’ का इतिहासपरक ब्योरा सामने रख दें। ‘परिमल : स्मृतियाँ और दस्तावेज़’ इसी आवश्यकता का प्रतिफल है। निश्चित ही, पाठकों को इस पुस्तक से हिन्दी साहित्य की एक अत्यन्त विवादास्पद बन चुकी घटना का यथार्थ चित्र मिलेगा। 

More Information
Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2026
Edition Year 2026, Ed. 1st
Pages 376p
Publisher Lokbharti Prakashan
Dimensions 14 X 13 X 2.5
Write Your Own Review
You're reviewing:Parimal : Smritiyan Aur Dastavej
Your Rating
Keshavchandra Verma

Author: Keshavchandra Verma

केशवचन्द्र वर्मा

जन्म : 1925; ज़िला—सुल्तानपुर।

शिक्षा : इलाहाबाद विश्वविद्यालय, एम.ए. अर्थशास्त्र।

साहित्य-सेवा : केशवचन्द्र वर्मा ने वर्षों के अपने सशक्त लेखन में कितने अछूते विषयों और भिन्न विधाओं में आधुनिक बोध और समकालीन परिवेश को समेटा है—यह देखकर आश्चर्य होता है। हिन्दी में हास्य व्यंग्य की विधा को साहित्यिक प्रतिष्ठा दिलाने में अग्रणी केशव जी के व्यंग्य उपन्यास, निबन्ध, कथा-कहानी, कविता-संकलन जितना चर्चित हुए—उतना ही उनकी नाट्य कृतियाँ, संस्कृति की नई पहचान कराती रचनाएँ—‘उज्ज्वल नील रस' और ‘समर्थारति' जैसी गम्भीर काव्य कृतियाँ तथा संगीत के सौन्दर्य पक्ष को श्रोताओं और पाठकों के लिए सुलभ कराती पुस्तकें हिन्दी साहित्य की अक्षयनिधि बन चुकी हैं। उन्होंने ‘छायानट' जैसी ललित कलाओं की पत्रिका का दस वर्षों तक उ.प्र. संगीत नाटक एकेडेमी के लिए संचालन और सम्पादन भी किया।

सम्मान : साहित्यिक उपलब्धियों के लिए अनेक सम्मान से सम्मानित किए गए।

निधन : 25 नवम्बर, 2007

Read More
Books by this Author
New Releases
Back to Top