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Pani Ka Shap : Bihar Mein Badh-Sukhad

Edition: 2026, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
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Pani Ka Shap : Bihar Mein Badh-Sukhad

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जो प्रायः हर साल बाढ़ या सूखे के कारण और कभी-कभी दोनों कारणों से चर्चा में बना रहता है। उत्तर बिहार में जहाँ सहायक धाराओं समेत नदियों की संख्या बहुत अधिक है, बाढ़ का क्षेत्र बना रहता है। ऐसा भी होता है कि नेपाल के क्षेत्र में अच्छी-खासी वर्षा हो जाने पर बिहार में बाढ़ आ जाती है और ऐसे समय में अगर स्थानीय वर्षा यहाँ न हो तो जहाँ-जहाँ नदी का पानी पहुँच जाता है वहाँ तो बाढ़ रहती है पर उसके ठीक बगल में आधे-पौने किलोमीटर के फासले पर सूखे का ही साम्राज्य बना रहता है। राज्य में गंगा के दक्षिण वाला इलाका, अगर आसमान से पानी न बरसे तो वर्षाभाव से त्रस्त रहता है। सिंचाई के क्षेत्र में आजादी के बाद बहुत प्रगति हुई है पर मौसम की अनिश्चितता अभी भी इन प्रयासों पर भारी पड़ती है। समय से अगर खेतों में बीज पड़ जाएँ, धान की रोपनी हो जाए, कुछ-कुछ भी पानी बरसता रहे और हथिया नक्षत्र की वर्षा समय से हो जाए तो किसान गंगा नहाएँ।

5 जनवरी, 1950 को पटना में पूना की सेंट्रल वाटरवेज, इरिगेशन एंड नेविगेशन कमीशन के एक्सीक्यूटिव इंजीनियर का बयान प्रमुखता से बिहार के अखबारों में छपा था जिसमें कहा गया था कि नेपाल में बराहक्षेत्र में कुतुबमीनार से तीन गुना ऊँचा बाँध बनेगा। उसके निर्माण से बिहार की बाढ़ और सिंचाई की समस्या का समाधान हो जाएगा। न यह बाँध बना और न समस्या का समाधान हुआ। यह अगर बन भी जाए तो इससे हमारी कितनी जरूरतें पूरी होंगी, यह विचारणीय विषय है। इतना जरूर हुआ कि विपत्ति के समय राहत-सामग्री मिलने लगी पर वह तो समाधान नहीं है। राहत सामग्री कितने दिन तक चल पाती है, यह तो हम सब जानते हैं। एक बदलाव जरूर स्पष्ट दिखाई पड़ता है कि हमारे श्रमिक जो पहले बंगाल या असम की तरफ जाते थे वे अब देश के पश्चिम और दक्षिण के राज्यों की तरफ जाने लगे हैं। रेलगाड़ियों के नाम श्रमजीवी एक्सप्रेस, गरीब रथ, श्रमशक्ति एक्सप्रेस आदि रखकर हमने अपनी स्थिति देश के सामने स्पष्ट कर दी है।

विकल्प के रूप में हमने राज्य की नदियों के किनारे तटबन्ध बनाए जिनकी लम्बाई 1950 के दशक में 160 कि.मी. ​थी और अब लगभग 3800 कि.मी. है। परिणाम हुआ कि तब राज्य का बाढ़ प्रवण क्षेत्र 25 लाख हेक्टेयर था, अब लगभग 74 लाख हेक्टेयर है। परिणाम की दृष्टि से यह एक चिन्ता का विषय होना चाहिए था पर इस पर कोई बहस नहीं होती। इस प्रयास का मूल्यांकन आवश्यक है और इसके विकल्पों की तलाश होनी चाहिए।

More Information
Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2026
Edition Year 2026, Ed. 1st
Pages 434p
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 24 X 17.5 X 2.5
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Author: Dinesh Kumar Mishra

दिनेश कुमार मिश्र

दिनेश कुमार मिश्र का जन्म 1946 में आजमगढ़, उत्तर प्रदेश में हुआ। उन्होंने खड़गपुर आई.आई.टी. से सिविल इंजीनियरिंग में बी.टेक. (1968) और एम.टेक. (1970) ​की डिग्री हासिल की। 2006 में उन्होंने वीर नर्मद विश्वविद्यालय, सूरत से डॉक्टरेट की उपाधि पाई।

1984 में उनकी सेवाएँ कोसी तटबन्ध में सहरसा में पड़ी दरार के कारण भुक्तभोगियों को पुनर्वासित करने के लिए ली गईं। इस दुर्घटना के विस्थापितों की स्थिति देखकर दिनेश कुमार मिश्र ने बिहार के बाढ़-पीड़ितों के साथ-साथ सूखा और अकाल-पीड़ितों की दुर्दशा का अध्ययन किया और यह क्रम अब भी रुका नहीं है। इस विषय पर उनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं—‘बाढ़ से त्रस्त–सिंचाई से पस्त : उत्तर बिहार की व्यथा-कथा’ (1990), ‘कोसी : उम्र कैद से सजा-ए-मौत तक’ (1992), ‘बन्दिनी महानन्दा’ (1994), ‘ऐसे आती है बाढ़’ (1996), ‘गंडक क्षेत्र और जल-जमाव का घाव’ (1996), ‘बोया पेड़ बबूल का : बाढ़ नियंत्रण का रहस्य’ (2000), ‘भुतही नदी और तकनीकी झाड़-फूँक’(2004), ‘बगावत पर मजबूर मिथिला की कमला नदी’ (2005), ‘कोसी नदी की कहानी : दुइ पाटन के बीच में...’ (2006) तथा ‘बागमती की सद्गति’ (2010)। इनमें से कई पुस्तकों के अंग्रेजी में अनुवाद भी प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अलावा बाढ़, सुखाड़ और अकाल सम्बन्धी उनके शताधिक लेख देश-विदेश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहे हैं। फिलहाल आजादी के बाद बिहार के बाढ़ और सुखाड़ तथा अकाल पर शृंखलाबद्ध वार्षिक रिपोर्ट लिखने में व्यस्त हैं।

ई-मेल : [email protected]

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