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Mornaach

Author: Nida Fazli
Edition: 2025, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
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Mornaach

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मोरनाच देवनागरी में आनेवाला निदा फ़ाज़ली का ऐसा संकलन है जिसमें उनकी अब तक की अधिकांश कविताएँ निरखी और परखी जा सकती हैं। इसमें पिछले पच्चीस बरसों की उनकी सोच-समझ और सरोकार का फैलाव है और अब तक आए तीनों मजमूओं में से ख़ुद लेखकीय चुनाव—इसीलिए एक अर्थ में यह निदा की प्रतिनिधि कविताओं का संग्रह भी कहा जा सकता है। इसमें ग़ज़लें भी हैं, नज़्में भी और कुछ गीत भी। शुरू का दौर भी है, बीच का भी और इधर का भी, लेकिन जो बात अव्वल से अब तक मुसलसिल बनी हुई है, वह है कवि का हर एक के लिए एक बेलौस लगाव—कुछ लोगों को यह सिनिसिज़्म की हदों को छूने वाला भी लग सकता है लेकिन शायद यह हर आधुनिक रचनाकार की मजबूरी है कि वह माँ, बाप, भाई, बहन, परिवार, स्त्री, प्रेम, समाज और देश—किसी को भी जस का तस स्वीकार नहीं करता। वह उन्हें सन्देह के कठघरे में धकेलकर सवाल करता है—ऐसे कि पहले वह सवाल पलटकर एक-एक कर ख़ुद उसका गिरेबान पकड़ ले और फिर अन्तत: समाज का होकर रह जाए। यही वह सच है जिसे अपने समय का हर सही रचनाकार अपने अनुभव की रोशनी में ही देखना और परखना चाहता है जैसाकि ख़ुद निदा फ़ाज़ली का ही एक दोहा है :

                         वो सूफ़ी का कौल हो या पंडित का ज्ञान,

                         जितनी बीते आप पर, उतना ही सच मान।

            —शानी

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Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2025
Edition Year 2025, Ed. 1st
Pages 152p
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 20 X 13 X 1
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Nida Fazli

Author: Nida Fazli

निदा फ़ाज़ली

निदा फ़ाज़ली का जन्म 12 अक्टूबर, 1938 को दिल्ली में हुआ। उनका प्रारम्भिक जीवन ग्वालियर में गुजरा। विक्रम विश्वविद्यालय से उन्होंने उर्दू और हिन्दी में एम.ए. किया। 1964 में मुम्बई गए। वहाँ ‘धर्मयुग’ और ‘ब्लिट्ज़’ पत्रिकाओं और अख़बारों में काम किया। उन्होंने कई फ़िल्मों के लिए गीत लिखे। कुछ फ़िल्मों के संवाद भी लिखे। हिन्दी-उर्दू काव्य-प्रेमियों के बीच समान रूप से लोकप्रिय और सम्मानित रहे। उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं—‘लफ़्ज़ों का पुल’, ‘खोया हुआ सा कुछ’, ‘आँख और ख़्वाब के दरम्यान’, ‘शहर तू मेरे साथ चल’, ‘दुनिया जिसे कहते हैं’, ‘मोरनाच’ (कविता); ‘दीवारों के बीच’ और ‘दीवारों के बाहर’ (आत्मकथा)।

उन्हें 1998 में ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ से पुरस्कृत और 2013 में ‘पद्मश्री’ से अलंकृत किया गया। इसके अलावा भी उन्हें कई पुरस्कार प्रदान किये गए।

8 फ़रवरी, 2016 को उनका निधन हुआ।

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