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Log Bistron Per-Hard Back

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खाँटी माटी के कथाकार हैं काशीनाथ सिंह। कथा साहित्य में ‘अकहानी’, ‘सचेतन कहानी’, ‘समान्तर कहानी’ आदि आन्दोलनों के काल से गुज़रे काशीनाथ सिंह ने भीड़ में होते हुए अपनी लीक स्वयं बनाई है। जो लोक रचा है उसका यथार्थ अपनी भाषा, शिल्प, कथ्य और दृष्टि में विश्वसनीय तो है ही, विलक्षण भी है। एक सेवानिवृत्त व्यक्ति की नज़र से देखी-लिखी गई कहानी ‘सुख’ सामाजिक यथार्थ को व्यक्त करनेवाली एक अलग कहानी है तो ‘संकट’ एक ऐसे फौजी चरित्र की कथा जो अपनी वासना की पूर्ति न होने पर कई मानसिक तनावों में घिरता और घेरते चला जाता है। ‘एक बूढ़े की कहानी’ एक नाबालिग लडक़ी से बलात्कार की बेहद मार्मिक कथा है। ‘चोट’ में जाति के अहं को जिस पैनी दृष्टि के साथ रचा गया है, वह बदलते युग में वर्ण से जुड़ी कई गिरहों को खोलने में मदद करती है। जबकि ‘सुबह का डर’ मनुष्यता और पुलिसिया आतंक के बीच फँसे लोगों के डर के संजाल की कहानी है। देखें तो, काशीनाथ सिंह के दो संग्रहों ‘लोग बिस्तरों पर’ और ‘सुबह का डर’ से शामिल कहानियों की इस एक जिल्द में ‘बैलून’ जैसी प्रेम कहानी है तो मौत के प्रति चिन्ता और चिन्तन के खोखलेपन से पर्दा हटाती ‘चायघर में मृत्यु’ जैसी कहानी भी। ‘आखिरी रात’ में दाम्पत्य जीवन के आर्थिक तनाव की कथा है, ‘अपने घर का देश’ में बदलते मूल्यों का गहन अंकन तो निरन्तर छीजती संवेदना का एक त्रासद रूप रचती पुस्तक की शीर्षक कहानी ‘लोग बिस्तरों पर’। निस्सन्देह, काशीनाथ सिंह का यह कहानी-संग्रह महत्त्वपूर्ण ही नहीं, अपने समय की एक दस्तावेज़ भी है।
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Language Hindi
Binding Hard Back, Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2019
Edition Year 2019, 1st Ed.
Pages 158p
Price ₹495.00
Publisher Rajkamal Prakashan
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Kashinath Singh

Author: Kashinath Singh

काशीनाथ सिंह

काशीनाथ सिंह का जन्म 1 जनवरी, 1937 को बनारस जि‍ले के जीयनपुर गाँव में हुआ। आरम्भिक शिक्षा गाँव के पास के विद्यालयों में हुई। उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. और पी-एच.डी. किया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफ़ेसर एवं विभागाध्यक्ष रहे।

उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं—‘लोग बिस्तरों पर’, ‘सुबह का डर’, ‘आदमीनामा’, ‘नई तारीख’, ‘सदी का सबसे बड़ा आदमी’, ‘कल की फटेहाल कहानियाँ’, ‘कहानी उपखान’, ‘पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा’, ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’, ‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ’ (कहानी-संग्रह); ‘घोआस’ (नाटक); ‘हिन्दी में संयुक्त क्रियाएँ’ (शोध); ‘आलोचना भी रचना है’ (समीक्षा); ‘काशी का अस्सी’, ‘रेहन पर रग्घू’, ‘महुआचरित’, ‘उपसंहार’ (उपन्यास); ‘याद हो कि न याद हो’, ‘आछे दिन पाछे गए’, ‘घर का जोगी जोगड़ा’, ‘आहटें सुन रहा हूँ यादों की’ (संस्मरण); ‘गपोड़ी से गपशप’, ‘बातें हैं बातों का क्या’, ‘हंसा करो पुरातन बात’ (साक्षात्कार)।

‘अपना मोर्चा’ का जापानी एवं कोरियाई भाषाओं में अनुवाद हुआ। जापानी में कहानियों का अनूदित संग्रह प्रकाशित। कई कहानियों के भारतीय और अन्य विदेशी भाषाओं में अनुवाद। उपन्यास और कहानियों की रंग-प्रस्तुतियाँ भी हुईं। ‘तीसरी दुनिया’ के लेखकों-संस्कृतिकर्मियों के सम्मेलन के सिलसिले में नवम्बर, 1981 में जापान-यात्रा।

उन्हें ‘भारत भारती पुरस्कार’, ‘कैफ़ी आज़मी अवार्ड’, ‘कथा सम्मान’, ‘समुच्चय सम्मान’, ‘शरद जोशी सम्मान’, ‘साहित्य भूषण सम्मान’, ‘रचना समग्र पुरस्कार’ और ‘रेहन पर रग्घू’ उपन्यास के लिए ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ से पुरस्कृत किया गया।

सम्प्रति : बनारस में रहकर स्वतंत्र लेखन। 

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