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अठारहवीं सदी में भारत ने राजनैतिक अव्यवस्था, प्रशासनिक दुर्बलता, आर्थिक अवनति और सांस्कृतिक पतन की अकल्पनीय परिस्थितियों का सामना किया। उस दौर के कई बादशाह विलासी और निहायत अदूरदर्शी रहे। ऐसे में व्यभिचार एवं भ्रष्टाचार के मामलों में वृद्धि हुई, जबकि जनकल्याण की अवधारणा पृष्ठभूमि में चली गई थी।

ऐसे समय में सैयद बन्धुओं—सैयद अब्दुल्ला ख़ान और सैयद हुसैन अली ख़ान  का उत्कर्ष हुआ। अपने पराक्रम और वीरता के लिए विख्यात ये दोनों भाई मुग़लों के वफ़ादार थे। उनको अपनी विवशता का वास्ता देकर, सत्ता-संघर्ष में भावनात्मक रूप से शहज़ादे फ़र्रूखसियर ने उन्हें अपने पक्ष में कर लिया था। अगले सात सालों तक इन भाइयों का ऐसा सिक्का चला कि बादशाह से कहीं बेहतर स्थिति उनकी रही। शाही विरासत के फ़ैसलों के साथ ही रोज़मर्रा के कामों में भी उनकी निर्णायक दख़ल रही। वस्तुत: वे मुल्क की बादशाहत को बनाने और बिगाड़ने वाले बन बैठे थे।

लेकिन इतना शक्ति सम्पन्न होने पर भी सैयद बन्धुओं को क्या मिला? एक की धोखे से हत्या कर दी गई जबकि दूसरे को ज़हर दे दिया गया। शाही सेना की अग्रिम पंक्ति में रहकर, शत्रुओं से टक्कर लेने वाले वे दोनों भाई, मुग़ल बादशाहों के महलों की राजनीति का शिकार तो नहीं हो गए थे? गलतियाँ तो उनकी भी रही होंगी!

इतिहास के उत्तर मुग़लकालीन इन अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर तलाशने की कोशिश करती यह पहली किताब है, जिसमें ‘किंगमेकर्स’ के रूप में मशहूर सैयद भाइयों के व्यक्तित्व और कृतित्व, उनके उत्कर्ष और पराभव की परतों को उघाड़ने के साथ ही मुग़ल वंश के पतन की स्थितियों पर भी पर्याप्त प्रकाश तथ्यसंगत डाला गया है। यह किताब भारतीय इतिहास के उस कालखंड का एक ऐसा दस्तावेज़ है, जिसकी अभी तक प्राय: अनदेखी की गई है। लेखक ने इस किताब को उपन्यास जैसी रोचक शैली में लिखा है, परन्तु इतिहास की प्रामाणिकता और विश्वसनीयता भी बनाए रखी है।

—प्रो. शशि प्रभा

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Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2023
Edition Year 2025, Ed. 2nd
Pages 232p
Price ₹299.00
Publisher Lokbharti Prakashan
Dimensions 22 X 14 X 1.5
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Rajgopal Singh Verma

Author: Rajgopal Singh Verma

राजगोपाल सिंह वर्मा

राजगोपाल सिंह वर्मा का जन्म 14 मई, 1957 को मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश में हुआ। उन्होंने पत्रकारिता तथा इतिहास में स्नातकोत्तर किया है। अब तक कुल 32 पुस्तकें प्रकाशित जिनमें 26 मूल तथा उर्दू, पंजाबी और अंग्रेज़ी में अनूदित चार पुस्तकें भी शामिल हैं। उन्होंने मुख्यतः ऐतिहासिक विषयों और जीवनीपरक किताबों का लेखन किया है।

उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं—‘बेगम समरू का सच : सरधना की चर्चित बेगम की कथा’, ‘पहली औरत : बेगम राना लियाकत अली की जीवनी’, ‘1857 का शंखनाद : उत्तर दोआब के लोक का संघर्ष’, ‘चिनहट : 1857 संघर्ष की गौरव-गाथा’, ‘किंगमेकर्स : मुग़ल बादशाहों पर भारी दो सैयद भाइयों की गाथा’, ‘औपनिवेशिक काल की जुनूनी महिलाएँ’, ‘जाने वो कैसे लोग थे : 1857 के क्रान्तिकारी’, ‘आख़िरी मुग़ल बादशाह का कोर्ट मार्शल’, ‘स्वर्णा : टैगोर की अल्पचर्चित विदुषी बहन की जीवनी’, ‘फ़िरंगी राजा’ (ऐतिहासिक उपन्यास), ‘दुर्गावती : गढ़ा की पराक्रमी रानी’, ‘जॉर्ज थॉमस : हांसी का फ़िरंगी राजा’, ‘सुभाष-एमिली : अधूरे प्रेम की पूरी कहानी’।

उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार की साहित्यिक पत्रिका ‘उत्तर प्रदेश’ का पाँच वर्ष तक सम्पादन किया तथा केन्द्र सरकार के अधीन स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण और लघु उद्योग मंत्रालय की पत्रिकाओं के सम्पादकीय दायित्व का भी निर्वहन किया। उन्हें ‘पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी सम्मान’, ‘पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ सम्मान’, कमलेश्वर स्मृति कथा सम्मान, ‘प्रेमचन्द सम्मान’ तथा ‘हरिवंशराय ‘बच्चन’ सम्मान से सम्मानित किया गया है।

ई-मेल : [email protected] 

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