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Firangi Raja

Edition: 2024, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Lokbharti Prakashan
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Firangi Raja

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आम इनसानों से लेकर ऋषि-मुनियों, तीर्थयात्रियों, पर्यटकों और घुमक्कड़ों के लिए हिमालय का आकर्षण हर काल में रहा है। इनमें से कुछ लोग तो यहाँ आए और यहीं के होकर रह गए। सैन्य जीवन की जटिलताओं से निकल कर आए ईस्ट इंडिया कम्पनी के एक फिरंगी सैन्य अधिकारी फ्रेडरिक विल्सन की कहानी कुछ ऐसी ही थी। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में अदम्य उद्यमशीलता के बलबूते उसने अपनी शरण स्थली गढ़वाल, हिमालय के हर्षिल क्षेत्र को आजीवन कर्मस्थली में परिणित कर दिया था। लगभग चार दशक तक उसके नाम का डंका ऐसे बजा कि तत्कालीन जनसाधारण से लेकर विशिष्ट जनों के मध्य वह ‘हर्षिल का राजा’ के रूप में चर्चित हो गया था। फ्रेडरिक विल्सन की उद्यमी सफलता की कहानियाँ आज भी गढ़वाली समाज में खूब कही और सुनी जाती हैं। गढ़वाल, हिमालय में उन्नीसवीं शताब्दी में एक तरफ वह प्रकृति का क्रूर विदोहक माना गया तो दूसरी ओर सर्वांगीण विकास का नव-प्रवर्तक भी साबित हुआ।

‘फिरंगी राजा’ में राजगोपाल सिंह वर्मा ने गढ़वाल में बीती विल्सन की जीवन-यात्रा को तत्कालीन स्थानीय वन्यता, इतिहास, संस्कृति, राजनीति, शासन-प्रशासन की कार्यशैली और विकास के विभिन्न पड़ावों के साथ बेहद खूबसूरत अन्दाज में रेखांकित किया है। यह उपन्यास उन्नीसवीं सदी के गढ़वाल का इतिहास नहीं है, पर उस कालखंड के मर्म को बखूबी उद्घाटित करता है। मानवीय साहस-दुस्साहस और उसकी प्रकृति के प्रति व्यवहार की परिणिति को विल्सन के उत्थान और अवसान के जरिये उपन्यासकार ने प्रभावी तथ्यों के साथ सामने रखा है। विल्सन की वेदना के माध्यम से यह उपन्यास हमें प्रकृति के प्रति संवेदनशील रहने का संदेश ही नहीं देता वरन उससे बढ़कर एक उपयोगी और कारगर नीति की रूपरेखा भी पेश करता है। इन अर्थों में यह उपन्यास नीति नियन्ताओं के लिए एक प्रामाणिक दस्तावेज की तरह है। उपन्यास में लेखक ने गढ़वाल के इतिहास में अकारण ही भुला दिये गए नायक/प्रतिनायक फ्रेडरिक विल्सन के समूचे जीवन और परिवेश को पठनीय रोचकता के साथ रचा है, जिसका स्वागत किया जाना चाहिए।  

—डॉ. अरुण कुकसाल 

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Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2024
Edition Year 2024, Ed. 1st
Pages 248p
Publisher Lokbharti Prakashan
Dimensions 21.5 X 14 X 1.5
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Rajgopal Singh Verma

Author: Rajgopal Singh Verma

राजगोपाल सिंह वर्मा

राजगोपाल सिंह वर्मा का जन्म 14 मई, 1957 को मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश में हुआ। उन्होंने पत्रकारिता तथा इतिहास में स्नातकोत्तर किया है। अब तक कुल 32 पुस्तकें प्रकाशित जिनमें 26 मूल तथा उर्दू, पंजाबी और अंग्रेज़ी में अनूदित चार पुस्तकें भी शामिल हैं। उन्होंने मुख्यतः ऐतिहासिक विषयों और जीवनीपरक किताबों का लेखन किया है।

उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं—‘बेगम समरू का सच : सरधना की चर्चित बेगम की कथा’, ‘पहली औरत : बेगम राना लियाकत अली की जीवनी’, ‘1857 का शंखनाद : उत्तर दोआब के लोक का संघर्ष’, ‘चिनहट : 1857 संघर्ष की गौरव-गाथा’, ‘किंगमेकर्स : मुग़ल बादशाहों पर भारी दो सैयद भाइयों की गाथा’, ‘औपनिवेशिक काल की जुनूनी महिलाएँ’, ‘जाने वो कैसे लोग थे : 1857 के क्रान्तिकारी’, ‘आख़िरी मुग़ल बादशाह का कोर्ट मार्शल’, ‘स्वर्णा : टैगोर की अल्पचर्चित विदुषी बहन की जीवनी’, ‘फ़िरंगी राजा’ (ऐतिहासिक उपन्यास), ‘दुर्गावती : गढ़ा की पराक्रमी रानी’, ‘जॉर्ज थॉमस : हांसी का फ़िरंगी राजा’, ‘सुभाष-एमिली : अधूरे प्रेम की पूरी कहानी’।

उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार की साहित्यिक पत्रिका ‘उत्तर प्रदेश’ का पाँच वर्ष तक सम्पादन किया तथा केन्द्र सरकार के अधीन स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण और लघु उद्योग मंत्रालय की पत्रिकाओं के सम्पादकीय दायित्व का भी निर्वहन किया। उन्हें ‘पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी सम्मान’, ‘पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ सम्मान’, कमलेश्वर स्मृति कथा सम्मान, ‘प्रेमचन्द सम्मान’ तथा ‘हरिवंशराय ‘बच्चन’ सम्मान से सम्मानित किया गया है।

ई-मेल : [email protected] 

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