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Jab Har Hansi Sandigdh Thi

Author: Parag Pawan
Edition: 2025, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
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Jab Har Hansi Sandigdh Thi

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‘मैंने जिसे देश समझकर प्यार किया वह विचारों की क़त्लगाह था।’

अपने आक्रोश और असहमति में पराग पावन जितने युवा हैं, अन्याय और शोषण की संरचना को समझने में उतने ही वयस्क। उनके इस पहले संग्रह में शामिल कविताओं का भावात्मक और भाषिक वैविध्य बताता है कि एक विधा के रूप में कविता को उन्होंने जितनी गम्भीरता से लिया है, वैसा कम ही युवा कवि करते हैं।

स्मृतियों में बसी ‘चूल्हे की राख’ से आरम्भ होकर ‘कथा कहूँ कवि गंग की’ शीर्षक एक सुदीर्घ आख्यानपरक कविता तक उठनेवाला यह संग्रह उन हत्यारों की पहचान भी करता है जो कभी आपकी अस्मिता तो कभी असमर्थता पर आक्रमण कर बिना हथियार ही आपको संसार से नफ़ी कर देते हैं; और उन प्रातिभ चापलूसों को भी दिखाता है जो ‘दुखी किसी-किसी को, ख़ुश अधिकांश को करते हुए’ सब कुछ को अपने अनुकूल करने में तल्लीन हैं।

पराग जहाँ ज़रूरी समझते हैं व्यंग्य को और जहाँ ज़रूरी समझते हैं करुणा को उसकी पूरी सम्भावना के साथ प्रयोग करते हैं। व्यक्ति और व्यवस्था, दोनों जगह निहित ख़तरों की पर्याप्त पहचान उन्हें हैं—‘गाँव 2020’ का अतियथार्थ हो या उस अध्यापक को याद करना जिसे बताना पड़‌ता है कि ‘प्रेम आदमी का अवैतनिक चिकित्सक है।’

‘बेरोज़गार’ शीर्षक पराग की बहुत चर्चित कविता-शृंखला के अलावा न्यायाकांक्षी युवा चेतना के और भी आयामों को रेखांकित करने वाली कविताएँ इस संग्रह में मिलेंगी, और एक नागरिक मन की उदासी भी जिसे कोई धोखा नहीं देता, सिवा उसकी उम्मीदों के।

साथ ही प्रेम के कंधे पर कुहनी टिकाए खड़ी उम्मीद भी यहाँ है—जहाँ शाम ख़त्म होती है/रात वहीं से शुरू नहीं होती/रात शुरू होती है तुम्हारे मेरा बाज़ू पकड़ने से/और उस बेआवाज़ वाक्य से/कि थक गए हो/चलो, घर चलें। 

More Information
Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2025
Edition Year 2025, Ed. 1st
Pages 160p
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 20 X 13 X 1
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Parag Pawan

Author: Parag Pawan

पराग पावन

पराग पावन का जन्म 30 अगस्त, 1994 को जौनपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ। उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से बी.ए., जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली से एम.ए. और पी-एच.डी. किया। हिन्दी की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ और शोध-आलेख प्रकाशित हैं। बांग्ला, उड़िया, मराठी, असमिया और अंग्रेज़ी में उनकी कविताओं के अनुवाद हुए हैं। ‘जब हर हँसी संदिग्ध थी’ पराग का पहला कविता-संग्रह है।

ई-मेल : [email protected]

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