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Hawa Bahut Tez Hai

Author: Kailash Banwasi
Edition: 2026, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
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Hawa Bahut Tez Hai

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कैलाश बनवासी ऐसे विरल कथाकार हैं जिनकी कहानियों में समाज के हाशिए के लोग बुलंद होकर बोलते हैं। ‘हवा बहुत तेज़ है’ उनका आठवाँ कहानी-संग्रह है जिसमें कुल ग्यारह कहानियाँ संकलित हैं। इन कहानियों के नायक एक तरफ़ मिस्त्री, प्लम्बर, चपरासी, वार्ड ब्वाय और रोज़गार की जद्दोजहद में फँसे युवा हैं तो दूसरी तरफ़ मध्यवर्ग के ऐसे अधेड़ हैं जिन्होंने बाज़ार और भ्रष्टाचार के बीच अपना ईमान और अच्छाइयाँ बचा रखी हैं या कि ऐसे मध्यवर्गीय लोग जो नए ज़माने की हवा के असर में तो हैं पर देश, काल और समाज का यथार्थ उन्हें अपनी तरफ़ खींच रहा है।

‘दाग़ अच्छे हैं’, ‘एक पुराना आदमी’, ‘मथुरा प्रसाद उर्फ़ राहत का एक नाम’, ‘गोपाल का गाना’ जैसी कहानियाँ कामगार वर्ग के बारे में अनेक शहरी मध्यवर्गीय पूर्वाग्रहों को तार-तार करने का काम करती हैं। ‘सब कुछ ठीक-ठाक है’ में कुछ भी ठीक-ठाक नहीं है। यह पहले से ही तबाह लोगों के कोरोना काल में बर्बाद हो जाने की कहानी है। यह उस लालची विसंगति की भी कहानी है जहाँ बहुतेरे प्लांट मालिकों ने कोरोना के नाम पर कंपनी को दिवालिया घोषित करवा के जनता का धन डकार लिया। दूसरी ओर उनमें काम करने वाले लोग सड़क पर आ गए। रोजगार की स्थितियाँ और उनके लिए संघर्ष दिन पर दिन बदतर ही होते गए हैं। ‘उन आँखों में अब कोई सपना नहीं है’ पढ़ते हुए बरबस अमरकान्त की कालजयी कहानी ‘डिप्टी कलेक्टरी’ याद आती है। ‘ज्ञान-विज्ञान-संज्ञान’ आज की उस उलटबाँसी को मानीख़ेज तरीक़े से रचती है जहाँ चीज़ों को देखने का एक अवैज्ञानिक रवैया सब तरफ़ पसर रहा है और विडम्बना यह है कि उसे विज्ञान के दम पर ही सत्य भी बताने की कोशिश की जा रही है।

इन कहानियों में कुछ लोगों के किसी भी क़ीमत पर बहुत तेज़ आगे बढ़ते जाने के बीच उन लोगों का जीवन-संघर्ष और सुख-दुःख दर्ज हुआ जिन्होंने अपने जीवन-मूल्यों से समझौता नहीं किया और दिशाहीन बदलाव की तेज़ हवा के बीच तनकर खड़े हैं। कैलाश को अमरकान्त और स्वयंप्रकाश जैसे सिद्ध कथाकारों की पंक्ति में रखकर देखा जाना चाहिए। इन कहानियों को पढ़ना अपने आसपास की दुनिया से नए सिरे से परिचित होना है, एक तेज़ भागमभाग में जिसकी तरफ़ से हमने निगाह फेर ली है।

More Information
Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2026
Edition Year 2026, Ed. 1st
Pages 200p
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 19.8 X 13 X 1.5
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Kailash Banwasi

Author: Kailash Banwasi

कैलाश बनवासी

कैलाश बनवासी का जन्म 10 मार्च, 1965 को दुर्ग, छत्तीसगढ़ में हुआ। उन्होंने गणित में बी.एस-सी. और अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. किया। 1984 के आसपास लिखना शुरू किया। आरम्भ में बच्चों और किशोरों के लिए ​लिखा। अस्सी से अधिक कहानियाँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं।

उनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं—‘लक्ष्य तथा अन्य कहानियाँ’, ‘बाज़ार में रामधन’, ‘पीले काग़ज़ की उजली इबारत’, ‘प्रकोप तथा अन्य कहानियाँ’, ‘जादू टूटता है’, ‘कविता पेंटिंग पेड़ कुछ नहीं’, ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दुस्तान’ (कहानी-संग्रह); ‘लौटना नहीं है’, ‘रंग तेरा मेरे आगे’ (उपन्यास); ‘सिनेमा भीतर सिनेमा’ (सिनेमा)। उनकी कहानियाँ गुजराती, पंजाबी, मराठी, बांग्ला तथा अंग्रेज़ी में अनूदित हुई हैं। कहानी-संग्रह ‘बाज़ार में रामधन’ मराठी में अनूदित है।

उनकी कहानी ‘कुकरा-कथा’ को पत्रिका ‘कहानियाँ मासिक चयन’ (सम्पादक—सत्येन कुमार) द्वारा 1987 का सर्वश्रेष्ठ युवा लेखन पुरस्कार मिला था। इसके अलावा उन्हें ‘श्याम व्यास पुरस्कार’, ‘प्रेमचन्द स्मृति कथा सम्मान’, ‘वनमाली कथा सम्मान’ तथा ‘गायत्री कथा सम्मान’ से भी सम्मानित किया गया है।

सम्प्रति : अध्यापन

ई-मेल : [email protected]

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