ज्ञानेन्द्रपति का होना कविता की कुछ विरल किस्में ईजाद करने वाले एक ऐसे कवि का होना है जिसे दुनिया की हर वस्तु काव्य-संभावना से युक्त लगती है। उनकी कविताओं में जनपदीय आभा है, स्थानीयता का गौरव है, आंचलिकता की उजास है तथा जीवन और जगत को मथने-भेदने वाले समकालीन मुद्दों की अनिवार्य अनुगूँज है। वस्तुनिष्ठता की शर्तों पर कविता की एकरस रीतिबद्धता से अलग राह बनाते हुए ज्ञानेन्द्रपति ने अपने जीवनावलोकनों से बहुधा मनुष्य को केन्द्र में रखते हुए अनेक चरित्रों, पदार्थों, स्थितियों एवं मानवीय उपस्थितियों में परकाया प्रवेश किया है।
एक दौर में जहाँ राजनीतिक तेवर वाली कविताएँ ही विशेषकर कवियों की पहचान के लिए रेखांकित की जाती थीं, ज्ञानेन्द्रपति ने कविता को निरे राजनीतिक प्रवाह में बहने न देकर उसे अपने समय की मानवीय कार्रवाई में बदलने का आह्वान किया। उनके लिए कविता कवि की कथनी नहीं, करनी है। इस सदी की कालांकित और कालजयी—सिद्ध होने वाली—कविता लिख रहे ज्ञानेन्द्रपति वस्तुतः निराला और मुक्तिबोध की सजग कवि-चेतना के प्रातिनिधिक कवि हैं।
ज्ञानेन्द्रपति के कवि की विशिष्टता इस बात तक सीमित नहीं है कि उन्होंने वस्तुनिष्ठता के साथ अपने समय के अनुभवों को कविता में साधा-सिरजा और बहुवस्तुस्पर्शी बनाया है बल्कि इसलिए भी है कि किसी अलौकिक या धार्मिक सत्ता पर आस्तिकता/आस्था का कन्धा टिकाए बगैर भारतीय जीवन-संस्कृति के मूलाधारों को कवितालोकित कर उन्होंने हमारे इस विश्वास को ही पुख्ता किया है कि भारतीयता से छिन्नमूल होकर एक भारतीय कवि का अपना रचनाधार जैसे-तैसे भले ही बन जाए किन्तु उसका जनाधार व्यापक नहीं हो सकता। इस संक्रान्ति-वेला में अपने समय-समाज की चिन्हारी के लिए ही नहीं बल्कि उद्वेलित करने वाले उस आनन्द के लिए भी, जो भाषिक सृजनात्मकता के बल पर कविता के ही दिए-किए सम्भव है, इस संकलन की कविताएँ हिन्दीभाषी जनता द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी पढ़ी जाएँगी।
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Hard Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 1999 |
| Edition Year | 2025, Ed. 2nd |
| Pages | 159p |
| Price | ₹695.00 |
| Publisher | Radhakrishna Prakashan |
| Dimensions | 22 X 14.5 X 1.5 |