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Dravida Rajneeti : Periyar Se Jayalalithaa Tak

Edition: 2026, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Radhakrishna Prakashan
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Dravida Rajneeti : Periyar Se Jayalalithaa Tak

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दुनिया में ऐसा जन-समूह शायद ही कोई हो जिसकी आनुवंशिकी मिश्रित न हो। भारत में ही ख़ानाबदोश समाज से लेकर अनेक तरह के सैन्य और व्यापारिक आवागमन होते रहे जिनसे रक्त और भाषा दोनों का मिश्रण हुआ। देखें तो ये विषय विज्ञान के हैं लेकिन तमाम आर्थिक और सामाजिक कारणों से राजनीति का विषय हो जाते हैं। मिसाल के तौर पर उन्नीसवीं सदी में आर्य और द्रविड़ नस्लों का विभाजन जो आज़ादी के बाद आज तक कभी भाषा और कभी संस्कृति के विवादों में सामने आ जाता है।

द्रविड़ राजनीति को आरम्भ से लेकर लगभग वर्तमान तक देखती-समझती यह पुस्तक इसी नस्ली विभाजन से अपनी बात शुरू करती है और थियोसोफ़िकल सोसायटी की स्थापना को इसका पूर्व-बिन्दु मानते हुए, कांग्रेस के गठन, दक्षिण में गांधी जी के हिन्दी प्रचार की शुरुआत और उसी दौरान पेरियार के रूप में एक ब्राह्मण-विरोधी व्यक्तित्व के उदय को द्रविड़ आन्दोलन की पहली निर्णायक घटना मानती है।

उसके बाद दक्षिण बनाम उत्तर का समीकरण सामने आया। जब कांग्रेस ‘अंग्रेजो, भारत छोड़ो’ कह रही थी तब पेरियार ने ‘आर्यो, बाहर जाओ’ का नारा दिया और 1946 में ‘द्रविड़ कड़‌गम’ का झंडा तैयार हुआ। फिर अन्नादुरइ ने पेरियार से अलग अपने दल द्रविड़ मुनेत्र कड़‌गम की घोषणा की।

स्वतंत्रता पूर्व इतिहास की इन पेचीदा गलियों से होती हुई द्रविड़ राजनीति की यह समीक्षा, एम.जी.आर., करुणानिधि, जयललिता, तमिल ईलम, राजीव गांधी की हत्या से होते हुए उत्तर और दक्षिण के ध्रुवीकरण की पड़ताल भी उसी गहराई से करती है और कोशिश करती है कि यह विरोध न रहे, भाषाओं का द्वन्द्व न हो, श्रेष्ठ और हीन का झगड़ा न हो।

इतिहास और राजनीति पर केन्द्रित होते हुए भी इस किताब ‘द्रविड़ राजनीति : पेरियार से जयललिता तक’ की विशेषता ये है कि यह अत्यन्त तथ्य-संकुल पाठ को भी एकदम बोलचाल की भाषा और संवादधर्मी शैली में पाठक के सामने रखती है, ताकि वह इस मसले पर अपने निजी विषय की तरह सोच सके।

More Information
Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2026
Edition Year 2026, Ed. 1st
Pages 224p
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 20 X 13 X 1.5
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Praveen Kumar Jha

Author: Praveen Kumar Jha

प्रवीण कुमार झा

प्रवीण कुमार झा का जन्म 2 जनवरी, 1980 को दरभंगा, बिहार में हुआ। उन्होंने पुणे और दिल्ली विश्वविद्यालय से क्रमशः एमबीबीएस और पोस्ट ग्रेजुएशन किया। वे विविध विषयों पर कथेतर रुचि के लेखक हैं और हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में लिखते हैं। उनके स्तम्भ प्रमुख अख़बारों और पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। उनकी लगभग पन्द्रह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। गिरमिटिया इतिहास पर उनकी पुस्तक ‘कुली लाइन्स’ और प्रवास-डायरी ‘खुशहाली का पंचनामा’ बहुचर्चित रही। हिन्दुस्तानी संगीत पर पुस्तक ‘वाह उस्ताद’ को कलिंगा लिटरेचर फेस्टिवल में ‘बुक ऑफ़ द ईयर’ (2021) से सम्मानित किया गया। वे देश-विदेश के भिन्न-भिन्न स्थानों पर कार्यरत रहे। फिलहाल नॉर्वे (यूरोप) में विशेषज्ञ चिकित्सक हैं।

ई-मेल : [email protected] 

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