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Dekhne Ke Tareeke

Author: John Berger
Translator: Ashish Mishra
Edition: 2025, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
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Dekhne Ke Tareeke

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जॉन बर्जर की इस किताब ने पेंटिंग और कला-आलोचना के बारे में सोचने का तरीक़ा बदल दिया। यह शब्दों और चित्रों के ज़रिए दिखाती है कि हम जो कुछ भी देखते हैं, वह हमेशा सुन्दरता, सत्य, सभ्यता, रूप, स्वाद, वर्ग और लिंग सम्बन्धी हमारे अनेक पूर्वग्रहों से प्रभावित होता है। जॉन बर्जर ऑयल पेंटिंग्स, फ़ोटोग्राफ़्स और ग्राफ़िक कला में छिपे अर्थों की तहदारी की पड़ताल करते हैं और यह तर्क देते हैं कि जब हम देखते हैं, तो हम केवल देख नहीं रहे होते— हम छवियों की भाषा को पढ़ रहे होते हैं।

हमारे समय के सबसे प्रभावशाली बुद्धिजीवियों में से एक  —ऑब्ज़र्वर

कला जगत के मुँह पर एक तमाचा... इस किताब ने ललित कला को पढ़ने और समझने के तरीके में क्रांति ला दी  —गार्जियन

बर्जर विचारों को उसी तरह सँभालते हैं जैसे एक कलाकार रंगों को सँभालता है’ —जेनेट विंटरसन

हम अपने चारों ओर की दुनिया को कैसे देखते हैं? यह उन कुछ निर्णायक कृतियों में से एक है, जिनके रचनात्मक विचारों ने कला, डिज़ाइन और मीडिया पर लेखन के ज़रिए हमारी दृष्टि को हमेशा के लिए बदल दिया।

More Information
Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Ashish Mishra
Editor Not Selected
Publication Year 2025
Edition Year 2025, Ed. 1st
Pages 192p
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 17.5 X 12 X 1.5
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Author: John Berger

जॉन बर्जर

ब्रिटेन के प्रसिद्ध कला समीक्षक, उपन्यासकार, निबन्धकार और चित्रकार जॉन बर्जर का जन्म 5 नवम्बर, 1926 को हुआ। जॉन बर्जर बीसवीं और इक्कीसवीं सदी की आलोचना और साहित्य की दुनिया के उन दुर्लभ हस्ताक्षरों में से हैं जिन्होंने कला, साहित्य और समाज–तीनों को जोड़कर समझने का काम किया। उनकी पुस्तक ‘Ways of Seeing’ और इसी नाम की बीबीसी टेलीविज़न शृंखला ने कला-आलोचना को केवल विशेषज्ञों तक सीमित रखने के बजाय आम पाठक और दर्शक तक पहुँचाया। बर्जर का साहित्यिक और आलोचनात्मक लेखन कला की दुनिया से आगे बढ़कर किसानों, मज़दूरों और आम जनजीवन की जटिलताओं तक फैला हुआ है। वे पेरिस और बाद के वर्षों में फ़्रांस के ग्रामीण इलाक़ों में रहे, जहाँ से उन्होंने पूँजीवाद, आधुनिकता और मनुष्य की बदलती स्थितियों पर गहन लेखन किया। उनके उपन्यास ‘G.’ को 1972 में ‘बुकर पुरस्कार’ से पुरस्कृत किया गया।

2 जनवरी, 2017 को उनका निधन हुआ। 

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